टाइगर ऑफ मैसूर ‘टीपू सुल्तान’ की जीवनी

अंग्रेजों से लोहा लेने वाले एक से बढ़कर एक स्वतंत्रता सेनानी हुए हैं। इसमें आम से लेकर खास लोग शामिल रहे हैं। टीपू सुल्तान जैसे योद्धाओं ने जब अंग्रेजों से लोहा लिया तो यह भारत की गुलामी के शुरुआती दिन ही थे। तब अँगरेज़ भारत में अपने पांव पसारने की कोशिश ही कर रहे थे।

टीपू सुल्तान ने इतनी कड़ाई से अंग्रेजों का मुकाबला किया था कि अंग्रेजों के दांत पूरी तरह से खट्टे हो गए थे। संभवतः इसीलिए टीपू सुल्तान को ‘मैसूर का टाइगर’ कहा जाता है। जाहिर तौर पर साहस और सूझबूझ के एक बेहतरीन प्रतीक के रूप में टीपू सुल्तान ने अपनी पहचान निर्मित की और इस पहचान को उन्होंने आजीवन कायम भी रखा।

अंग्रेजों के खिलाफ उन्होंने जिस तरह से लड़ाई लड़ी, इसके लिए उन्हें भारत के पहले ‘फ्रीडम फाइटर’ के रूप में भी याद किया जाता है।

20 नवंबर 1750 ईस्वी को जन्मे टीपू सुल्तान का पूरा नाम सुल्तान सईद वाल्शारीफ फतह अली खान बहादुर शाह टीपू था। देवनहल्ली नामक स्थान, जो इस वक्त ‘बेंगलुरू कर्नाटका’ में है, वहां इनका जन्म हुआ था। इनके पिता ‘हैदर अली’ तो मां का नाम ‘फातिमा फख-उन-निसा’ था।

अपने पिता हैदर अली की मौत के बाद टीपू सुल्तान ने मैसूर का राज-काज संभाल लिया था और धीरे-धीरे अपने सल्तनत की सीमाएं बढ़ाने लगे थे।

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टीपू सुल्तान को ‘मैसूरियन राकेट’ का आविष्कार करने के लिए भी जाना जाता है। यहां तक कि टीपू सुल्तान को रॉकेट का पहला अविष्कारक भी माना जाता है। और उसके इस राकेट से अंग्रेज और उसकी सेना थर्राती थी। यह समझना मुश्किल नहीं है कि टीपू सुल्तान एक स्तर पर कितना दूरदर्शी नेता था।

खुद डॉक्टर अब्दुल कलाम ने टीपू सुल्तान के मैसूरियन राकेट का जिक्र अपनी किताब ‘अग्नि की उड़ान’ में किया है।

हालांकि टीपू सुल्तान के पिता हैदर अली बहुत पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन उनकी समझ किसी पढ़े-लिखे से कोसों आगे थी। इसलिए उन्होंने टीपू सुल्तान की शिक्षा और उसके योद्धा बनने पर खासा ध्यान दिया। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि टीपू सुल्तान का राजनीतिक प्रशिक्षण ‘फ्रांसीसी ऑफिसर’ द्वारा किया गया था।

वैसे भी टीपू को ना केवल हिन्दी बल्कि उर्दू, फारसी, अरबी, कन्नड़ और दूसरी भाषाएं बेहतरीन ढंग से आती थीं। मात्र 15 साल की उम्र से ही टीपू सुल्तान कई सैन्य अभियानों में भाग लेने लगे थे। 1766 ईस्वी में ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ हुई पहली मैसूर की लड़ाई में उन्होंने अपने पिता के साथ युद्ध लड़ा था और तब अंग्रेज भाग खड़े हुए थे।

हालाँकि अंग्रेजों के साथ कई निजाम भी मिले होते थे, लेकिन उनके पिता के जमाने से ही उन निजामों को मात देने की प्रथा टीपू सुल्तान ने भी कायम रखी।

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प्रजा का सुख-दुख टीपू सुल्तान के लिए हमेशा सर्वोपरि रहा और इसीलिए प्रजा से उन्हें सम्मान भी मिला। अंग्रेजों के साथ ऐसा नहीं है कि उन्होंने केवल लड़ाई ही लड़ी, बल्कि शांति के लिए उन्होंने मंगलौर की संधि भी कर ली थी। इतना ही नहीं, उन्होंने मराठों और मुगलों के साथ अपने सैन्य-शासन को मजबूत करने के लिए गठबंधन की रणनीति पर भी काम किया।

साथ ही अपने पिता की कई योजनाओं जैसे- सड़क, बांध आदि को भी टीपू सुल्तान ने प्राथमिकता के साथ पूरा किया।

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हालांकि अंग्रेजों की सैन्य शक्ति कहीं ज्यादा मजबूत थी और भारत में भी कई शासकों और निज़ामों ने लार्ड कार्नवालिस जैसे अंग्रेज का साथ दिया। तकरीबन 2 साल तक लड़ाई करने के बाद इस क्रम में टीपू सुल्तान ने ‘श्रीरंगपट्टनम की संधि’ पर साइन कर लिया था और कुछ पल के लिए ही सही अपनी प्रजा में शांति का संचार किया था।

वहीं तीन बड़ी लड़ाईयों में अंग्रेजों को एक तरह से धूल चटाने के बाद चौथी बार ईस्ट इंडिया कंपनी ने टीपू पर जब हमला किया, तब 4 मई 1799 को यह योद्धा वीरगति को प्राप्त हुआ।

कारगिल के महान नायक कैप्टन ‘विक्रम बत्रा’

कहा जाता है कि अगर हम चैन की सांस ले रहे हैं तो यह सिर्फ उनकी बदौलत है जो सीमाओं पर हमारी रक्षा के लिए अनवरत खड़े हैं।

वह चाहे धूप हो, चाहे बरसात हो, चाहे बर्फ पड़ रही हो या फिर रेगिस्तान की गर्मी क्यों ना हो लेकिन हमारे महान नायक हमें 24 घंटे, साल के 365 दिन सुरक्षा प्रदान करने के लिए जान की बाजी लगाने को हरदम तैयार हैं।

इन लड़ाकों में से एक नाम है कैप्टन ‘विक्रम बत्रा’ का, जिन्होंने 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान अपनी जाबांजी से प्रत्येक भारतवासी को नतमस्तक कर दिया था। आप शायद यह नहीं जानते होंगे कि लाखों की मोटी सैलरी ठुकरा कर उन्होंने भारतीय सेना में जाने का विकल्प चुना था।

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आप शायद यह भी नहीं जानते होंगे कि अपनी शादी को टाल कर यह जांबाज़ देश पर शहीद हो गया।

1974 ईस्वी में पालमपुर में 9 सितंबर को विक्रम बत्रा का जन्म हुआ था। इनके साथ ही इनके जुड़वा भाई भी धरती पर आए। दोनों के बचपन का नाम लव और कुश था, जो बाद में विक्रम और विशाल के रूप से जाने गए। इनकी मां टीचर थीं, इसीलिए घर पर ही इनकी पढ़ाई शुरू की गई।

बाद में पालमपुर के सेंट्रल स्कूल में इनका दाखिला हुआ। विक्रम शुरू से ही क्लास में एक्टिव रहे और शिक्षकों के प्रिय भी रहे। चाहे पढ़ाई हो या स्पोर्ट्स ही क्यों ना हो, एक ऑलराउंडर के तौर पर स्कूल में हमेशा सबसे आगे रहे विक्रम। उनके स्कूल के पास आर्मी का ‘बेस-कैम्प’ था, इसीलिए उनके मन में शुरू से ही सेना में जाने का सपना पलने लगा था।

उनके पिता भी उन्हें सेना की वीरता के किस्से सुनाया करते थे। चंडीगढ़ के ‘डीएवी कॉलेज’ से उन्होंने साइंस में ग्रेजुएशन किया और इसी दौरान वह एनसीसी के बेस्ट कैडेट के रूप में चुने गए। इतना ही नहीं, उन्होंने गणतंत्र दिवस की परेड में हिस्सा लिया और अपने दोस्तों के बीच काफी पॉपुलर भी हुए।

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धीरे -धीरे उनके सेना में जाने की इच्छा और बढ़ने लगी थी, तो उनके दोस्त और उनका सर्कल भी उन्हें सेना में जाने के लिए प्रेरित करने लगा था। हालांकि उन्होंने मर्चेंट नेवी के लिए भी परीक्षा दी थीं और परीक्षा पास होने के बाद मर्चेंट नेवी से उनका जॉइनिंग लेटर भी आ गया।

वह ‘पोलैण्ड’ जाने के लिए रेडी हो गए थे, लेकिन अचानक विक्रम ने अपना सर झटका और मां की गोद में सर रखकर बोले कि उन्हें तो इंडियन आर्मी ही ज्वाइन करनी है।

लाखों रुपए की नौकरी वह ठुकरा चुके थे।

बाद में 1996 में इंडियन मिलिट्री एकेडमी देहरादून में वह सिलेक्ट हो गए और उनके बचपन का सपना एक तरह से पूरा हो गया था।

विक्रम की ट्रेनिंग के पूरा होने के बाद 6 दिसंबर 1997 को उन्हें जम्मू के सोपोर में ’13वीं जम्मू कश्मीर राइफल्स’ में लेफ्टिनेंट के पद पर ज्वाइनिंग मिल गयी। मात्र डेढ़ साल बाद ही 1999 में कारगिल की लड़ाई शुरू हो गई और विक्रम को इस लड़ाई के लिए जाना पड़ा। इस लड़ाई में उन्होंने ‘हम्प’ व ‘राकी’ नाब पर भारत का झंडा गाड़ा तो उन्हें कैप्टन की पदवी मिली।

फिर आगे बढ़ कर उन्होंने ‘श्रीनगर लेह’ के ऊपर 5140 चोटी को पाक सेना से मुक्त कराने का संकल्प लिया जो उस वक्त एक दुर्गम कार्य था। पर यह विक्रम बत्रा थे। बेहद ऊंची चोटी पर होने के बाद भी उन्होंने दुश्मन को ललकारते हुए अपने साथ लेफ्टिनेंट अनुज नैय्यर को लेकर पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया।

यह मिशन पूरा हो गया था और विक्रम बत्रा ‘दिल मांगे मोर’ के साथ आगे बढ़ने ही वाले थे, ठीक इसी समय अपने एक जूनियर लेफ्टिनेंट नवीन पर उनकी नजर गई। लेफ्टिनेंट नवीन युद्ध में घायल हो गए थे और विक्रम उन्हें अपने कंधे पर उठाकर आगे बढ़ ही रहे थे, तभी एक पाकिस्तानी सैनिक की गोली उनकी छाती में लग गई।

हालांकि गोली लगने के बावजूद भी विक्रम रुके नहीं और अपनी आखिरी सांस तक पाकिस्तानियों पर टूटते रहे।

अपने इस महान साहस के लिए विक्रम बत्रा को ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया गया। जाते-जाते यह योद्धा तिरंगे में लिपटने की अपनी अंतिम इच्छा को भी पूरी कर चुका था और साथ ही देशवासियों को नतमस्तक कर चुका था।

इस महान नायक की प्रेम-कहानी के बिना इसकी कहानी पूरी नहीं होगी। आप यह जानकर आश्चर्य करेंगे कि 1995 जब विक्रम अभी सेना में नहीं गए थे, तभी पंजाब यूनिवर्सिटी में ‘डिंपल’ नामक लड़की से उनका दिल लग गया था। लेकिन तभी 1996 में विक्रम आर्मी में सिलेक्ट हो गए थे और उन्हें अपना प्यार छोड़कर ड्यूटी पर जाना पड़ा।

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कारगिल लड़ाई के बाद लौटकर वह डिंपल से शादी करना चाहते थे, लेकिन कौन जानता था कि उनकी शादी और उनका सब कुछ देश बन चुका था। अपनी जान देकर विक्रम ने देश के प्रति अपने प्रेम को साबित भी किया।

आप इस महान नायक के बारे में क्या कहेंगे, कमेंट बॉक्स में अपने विचार अवश्य बताएं।

आध्यात्मिक गुरु नानक देव की जीवनी

दुनिया में एक से बढ़कर एक गुरु (लीडर्स) हुए हैं जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में ना केवल छाप छोड़ी है, बल्कि वर्तमान से आगे भविष्य तक में अपने विचारों की गहराई से समाज को सकारात्मक ढंग से प्रभावित करने का कार्य किया है। इन्हीं नायकों में सिक्ख धर्म के प्रवर्तक ‘गुरु नानक देव’ जी का नाम आदर के साथ लिया जाता है।

इनके जीवन से संबंधित एक से बढ़कर एक कथाएं प्रचलित हैं, जो बताती हैं कि इन्होंने कितनी तन्मयता से और कितने साफ मन से समाज को राह दिखाने का कार्य किया।

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इनके एक नाम नहीं थे, बल्कि नानक शाह, बाबा नानक इत्यादि नाम भी इन्हीं के थे।आध्यात्मिक गुरु होने का मतलब यह कतई नहीं है कि उन्होंने अंधविश्वासों का समर्थन किया बल्कि अंधविश्वासों का उन्होंने सदा ही विरोध किया।

देश में एक कोने से दूसरे कोने तक और देश से बाहर मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया में उन्होंने अपनी यात्रा से अपने विचारों को प्रसारित करने का कार्य किया।

15 अप्रैल 1469 ईस्वी को रावी नदी के किनारे तलवंडी जो अब पाकिस्तान में है, वहां गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ था। इनके पिता कल्याण चंद जी को ‘मेहता कालू’ के नाम से जाना जाता था। वह स्थानीय प्रशासन में राजस्व के अधिकारी थे और इनकी माता तृप्ता देवी थीं। वहीं इनकी पत्नी सुलक्षिणी देवी थीं और इनके दो बच्चे श्रीचंद और लखमी दास थे। इनकी एक बहन नानकी देवी का भी जिक्र आता है।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इतना बड़ा पथ-प्रदर्शक और विचारक स्कूल से दूर ही रहा, क्योंकि उनका मन पढ़ाई लिखाई में नहीं लगता था। नानक देव सांसारिक विषयों के प्रति बहुत ज्यादा लगाव नहीं रखते थे और साधु-संतों इत्यादि के साथ भजन कीर्तन में लगे रहते थे।

उनकी इस प्रकार की रुचि देखकर उनके पिता बड़े परेशान रहते थे और जानवर चराने से लेकर दुकान खोलने तक के दूसरे कार्य उन्हें सौंपते रहते थे। लेकिन उनका मन ना लगना था और ना लगा, बल्कि वह अपनी पूंजी गरीबों और दीन दुखियों में लुटा और देते थे।

इससे संबंधित एक प्रसंग आता है!

दुकान के लिए उनके पिता ने उन्हें ₹20 देकर बाजार से सच्चा सौदा (सामान) लाने के लिए कहा, किंतु जब वह शाम को घर आए तो उनके पिता के पूछने पर उन्होंने बताया कि उन्होंने सच्चा व्यापार किया है और गरीबों को खाना खिलाया है।

यह बिल्कुल सत्य घटना है और आज भी उसी स्थान पर सच्चा सौदा नामक गुरुद्वारे का निर्माण किया गया है।

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बाद में सामाजिक बंधन में बांधने के लिए उनकी शादी भी की गई, लेकिन शादी के बाद भी वह आत्म चिंतन करते रहते थे। इससे संबंधित ज्ञान का प्रकाश फैलाने में गुरु नानक देव जी ने कभी भी कोताही नहीं की। वह हमेशा कहते थे कि ईश्वर हमारे अंदर ही है और अगर हमारे हृदय में प्रेम, करुणा, दया का भाव रहता है तो वह हमें देखते हैं। जबकि हमारे हृदय में क्रोध, निर्दयता, नफरत, निंदा इत्यादि का भाव हो तो ईश्वर हमें नजर नहीं आते।

इस तरीके से वो आडम्बरों का भारी विरोध करते थे। इसका एक और उदाहरण हमें मिलता है, जब उनके पिता ने उनका जनेऊ संस्कार कराना चाहा।

सभी संबंधियों की सभा में जब नानक देव जी ने यह कहा कि उन्हें कपास के सूत पर भरोसा नहीं है, बल्कि सदाचार और अच्छे आचरण, अच्छे व्यवहार से ही मन को पवित्र किया जा सकता है।

शुरू में गुरु नानक देव जी की बातों पर किसी ने भरोसा नहीं किया, लेकिन बाद में उनकी प्रसिद्धि बढ़ती चली गई।

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धीरे-धीरे गुरु नानक देव जी को मर्दाना, रामदास, लहरा, बाला इत्यादि लोगों के रूप में सच्चे शिष्य मिल गए और इनके साथ ही इन्होंने विभिन्न जगहों की यात्राएं शुरू कर दीं। भारत और अफगानिस्तान जैसे दूसरे देशों की इनकी यात्राएं काफी प्रसिद्ध हैं तो भारत में इन्होंने एक कोने से दूसरे कोने तक की यात्रा की।

उनकी ये यात्रायें तकरीबन 8 साल तक चलीं, जिन्हें “उदासियाँ” कहा जाता है। कहते हैं 1507 से 1515 ईस्वी तक नानक देव जी ने अपनी पहली यात्रा यानी उदासी में अपनी शिक्षाओं और सच्चे संदेश का प्रसार किया।


इसी प्रकार 1517 ईस्वी में इन्होंने 1 साल तक अपनी दूसरी यात्रा यानी दूसरी उदासी शुरू की थी और लोगों को मानवता का ज्ञान दिया। तीसरी उदासी की तिथि 1518 से 1521 ई. तक तकरीबन 3 साल की रही।

अपनी तीसरी उदासी में जब मुग़ल सल्तनत के पहले शासक बाबर ने भारत पर आक्रमण करना शुरू किया, तब गुरु नानक देव जी ने अपनी यात्राओं को समाप्त किया और करतारपुर में बस गए। वह अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक यहीं रहे।

जाहिर तौर पर भारतवर्ष के महान धार्मिक नेताओं में गुरु नानक देव जी का नाम आदर के साथ लिया जाता है। उन्होंने ईश्वर के एक होने की, उसके कण-कण में मौजूद होने की और उसी ईश्वर की आराधना करने की पैरवी की। सच्चाई ईमानदारी और कठिन परिश्रम से धन कमाने को उन्होंने खुशी माना, तो भगवान से अपनी गलतियों के लिए क्षमा मांगना उन्होंने सर्वोच्च माना।

इसी तरह से उनकी कई शिक्षाएँ और ज्ञान सिक्खों के सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब’ में उल्लिखित हैं। आज भी संपूर्ण विश्व में गुरु नानक देव की शिक्षाओं पर चलने वाले करोड़ों लोग उन्हें आदर सहित याद करते हैं।

‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा’!

इस टाइटल से ही आप समझ गए होंगे कि दास्तान-ए-नायक ‘सुभाष चंद्र बोस’ के बारे में हम बात करने वाले हैं। इतिहास के पन्नों को जब आप पलटते हैं तब आपको एहसास होता है कि हमारी खुशियों के लिए, हमारी आजादी के लिए और हमारे भविष्य के लिए कितने महापुरुषों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए हैं। कितने महानायकों ने अपने खून को पानी की तरह बहाया है।

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23 जनवरी 1897 को उड़ीसा में कटक नामक जगह पर सुभाष चंद्र बोस का जन्म हुआ था। यूं तो इस महानायक के बारे में प्रत्येक भारतीय को तमाम किस्से रटे रटाये हैं किंतु आप यह जान लीजिए कि जिस आईएएस की परीक्षा के लिए आज देशभर के प्रतिभावान छात्र छात्राएं यूपीएससी की परीक्षाएं देते हैं, उसकी जी-जान से तैयारी करते हैं, उस परीक्षा को अंग्रेजों के जमाने में ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने उत्तीर्ण कर लिया था।

हालाँकि, देशभक्ति की खातिर उन्होंने अंग्रेजी नौकरी को ठोकर मारी और गांधी जी के अहिंसक आंदोलन में शामिल हुए। बाद में भारत माँ की आज़ादी के लिए उन्होंने ‘आजाद हिंद फौज’ का गठन कर लिया।

वस्तुतः नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने क्या नहीं किया?

देश की आजादी के लिए पहले वह अहिंसक आंदोलन में शामिल रहे, बाद में उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभाला। गांधी जी से वैचारिक भिन्नता के कारण उन्होंने अध्यक्ष पद का चुनाव जीतने के बाद भी कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया, ताकि कांग्रेस में फूट न पड़े।

इतना ही नहीं… नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भारत की ओर से जर्मनी, जापान जैसे देशों की यात्राएं की और वहां जो भारतीय कैदी थे उनको संगठित करके आजाद हिंद फौज में शामिल करके एक महान सेनानाय के रूप में भी उभरे।

इतना ही नहीं, अंग्रेजों द्वारा बंदी बनाए जाने के बाद वह ब्रिटिश प्रशासन की आंखों में धूल झोंक कर नजरबंदी से फरार हुए और अंत में उनकी मौत हुई या नहीं हुई इस पर भी रहस्य बना रहा!

हद तो तब हो गई… जब आजादी के बाद भी यह खबरें फैलीं कि गुमनामी बाबा के रूप में खुद सुभाष चंद्र बोस कई वर्षों तक जीवित रहे थे।

तात्पर्य है कि सुभाष चंद्र बोस ने देश के लिए हर वह काम किया, देश के लिए जिए, देश के लिए गुमनामी में गए और देश के लिए मरे भी!

भारत के पहले अंतरराष्ट्रीय शख्स के रूप में अगर सुभाष चंद्र बोस को चित्रित किया जाए तो कोई गलत नहीं होगा।

आखिर अपने लेवल पर विदेश नीति को समझना और दूसरे देशों से संबंध विकसित करना किसी और के वश की बात ही नहीं थी। महान सेनापति, महान राजनीतिज्ञ, महान अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिज्ञ के रूप में सुभाष चंद्र बोस का तत्कालीन समय में एकाधिकार था।

युवाओं के मन पर सुभाष चंद्र बोस का कितना अधिकार था, इसे आप रंगून के जुबली हाल में दिए गए एक भाषण से समझ सकते हैं। इस भाषण में उन्होंने स्पष्ट कहा था कि ‘स्वतंत्रता बलिदान मांगती’ है अगर कोई खून दे सकता है, तो वही आजादी की कल्पना कर सकता है।

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इसी भाषण में उन्होंने ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ का चिर स्थाई नारा दिया था।

उनके इस नारे से समस्त भारत का युवा वर्ग आंदोलित हो गया था और अंग्रेज सरकार की चूलें हिल गई थीं। यह सत्य है कि इतना लोकप्रिय नारा भारतीय इतिहास में शायद ही कोई दूसरा हुआ होगा!

आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी उस समय भारतीय पटल पर छाए हुए थे। कई बार उनके फैसलों को चुनौती देने वाला तब कोई नेता नहीं दिखता था। ऐसे में सुभाष चंद्र बोस ने एक छत्र राजनीतिक वर्चस्व को चुनौती देते हुए महात्मा गांधी के समर्थन वाले व्यक्ति को कांग्रेस अध्यक्ष पद हेतु हरा दिया था।

हालांकि बाद में कांग्रेस में फूट न पड़े, इसके लिए उन्होंने स्वयं ही कांग्रेस से अलग हो जाना बेहतर समझा और ‘फारवर्ड ब्लाक’ का अलग से गठन किया।

सच कहा जाए तो इस महान योद्धा के कुछ दाव संयोगवश उल्टे पड़े! द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी-जापान के साथ बेहद अच्छा संबंध विकसित करने वाले सुभाष चंद्र बोस और भारत की किस्मत ही खराब थी।

चूंकि द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी जापान के गठबंधन की हार हो गई थी और इसी वजह से आजाद हिंद फौज को भी पीछे हटना पड़ा था।

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हालांकि हिटलर से संबंधों के चलते कुछ लोग नेताजी की आलोचना भी करते हैं, किंतु अपने देश के लिए उन्हें सब कुछ मंजूर था, यहां तक कि अपनी आलोचना भी। उनका एकमात्र लक्ष्य था कि कैसे अपनी मातृभूमि को स्वतंत्र कराएं और इसमें वह किसी प्रकार की कसर नहीं छोड़ना चाहते थे।

आप इस महानायक के बारे में क्या कहेंगे कमेंट बॉक्स में अवश्य बताएं।

ताजमहल के निर्माणकर्ता ‘शाहजहां’ की कहानी

अगर संपूर्ण विश्व में भारत की पहचान से जुड़े कुछ प्रतीकों को उल्लिखित करने की बात आए तो उसमें ताजमहल का नाम ऊपरी क्रम में होगा। निश्चित रूप से विश्व के आश्चर्य में गिने जाने वाले ताजमहल ने अपने निर्माण के समय से ही वैश्विक पर्यटकों में उत्सुकता जगा रखी है।

पर क्या इसके शासक की कहानी हम जानते हैं?

शाहजहां को मुगलकाल में कला और साहित्य को सर्वाधिक बढ़ावा देने वाला शासक माना जाता है। वस्तुतः इसे स्थापत्य कला का स्वर्णिम युग और भारतीय सभ्यता का समृद्ध काल माना जाता है। शाहजहां के पिता बादशाह ‘जहांगीर’ तो उनके दादा ‘सम्राट अकबर’ थे। अपने पिता की मौत के बाद कम उम्र में ही शाहजहां ने मुगल साम्राज्य का राजपाट संभाल लिया था।

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मात्र 21 साल की आयु तक ही शाहजहां ने काफी कुछ हासिल कर लिया और अपने साम्राज्य का विस्तार भी किया।

जनवरी 1592 को लाहौर में शाहजहां का जन्म हुआ था। इनके पिता के बारे में हम जानते ही हैं कि वह सम्राट जहांगीर थे, तो इनकी माता जगत गोसाई यानी ‘जोधाबाई’ थीं। कहा जाता है कि सम्राट अकबर द्वारा शाहजहां को गोद लिया गया था और उन्होंने ही इनकी परवरिश की। शुरुआत में दादा अकबर इन्हें शहजादा ‘खुर्रम’ कहा करते थे।

यह भी कहा जाता था कि शाहजहां और जहांगीर के रिश्ते मधुर नहीं थे, क्योंकि जहांगीर की पत्नी नूरजहां से उनकी नहीं बनती थी। बाद में अपने पिता से बगावत करके शाहजहां ने मुगल साम्राज्य का कार्यभार संभाला था। 1627 ईस्वी में जहांगीर की मौत हो गई थी और शाहजहां ने नूरजहां की चालों को विफल करते हुए मुगल साम्राज्य के दूसरे दावेदारों की हत्या करा दी थी।

इनमें दाबर बख्श, होसंकर, गुरुसस्प, शहरयार इत्यादि शामिल थे। शाहजहां के सबसे भरोसेमंद उसके ससुर आसिफ खान थे जिनकी मदद से उसने इस कार्य को अंजाम दिया था।

बहरहाल अपनी कूटनीति से 1628 से 1658 ईस्वी तक तकरीबन 30 सालों तक शाहजहां ने शासन किया। अपने शासनकाल में शाहजहां ने आगरा के ‘ताजमहल’ के साथ कई सारे निर्माण कराए और हिंदू मुस्लिम दोनों की परंपराओं को बढ़ाने का भी उन्हें श्रेय दिया जाता है। शाहजहां काल एक तरह से शांति का काल माना जाता है और ना केवल देश में बल्कि अपनी कूटनीति के चलते विदेशों… जिनमें फ्रांस, पुर्तगाल, इटली, इंग्लैंड जैसे देश शामिल हैं, उनसे भी शाहजहां का अच्छा संबंध स्थापित हो गया था।

1639 ईस्वी में शाहजहां द्वारा अपनी राजधानी को दिल्ली लाया गया जिसे शाहजहानाबाद नाम दिया गया। दिल्ली में जामा मस्जिद, लाल किला और दूसरी इमारतों का निर्माण शाहजहां के हाथों ही हुआ।

हालाँकि शाहजहां के काल में कई जगह पर विद्रोह भी हुए हैं जिनमें बुंदेलखंड का विद्रोह प्रमुख माना जाता है। इसके अलावा अफगान सरदार खाने – जहाँ लोदी द्वारा मालवा की सूबेदारी में भी विद्रोह भड़का। सिक्खों के गुरु हरगोविंद सिंह का विद्रोह शाहजहां के ही काल में हुआ। हालांकि इन सारी चीजों पर शाहजहां की बुद्धिमता भारी पड़ी।

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साल 1612 में खुर्रम यानी शाहजहां का विवाह आसिफ खान की पुत्री ‘आरजूमंद बनू बेगम’ यानी ‘मुमताज महल’ से हुआ था। ना केवल मुमताज महल बल्कि शाहजहां की और भी कई पत्नियां थीं, लेकिन वह इन्हें सबसे ज्यादा चाहते थे। कहा तो यहां तक जाता है कि जब अपने 14वें बच्चे को जन्म देते हुए ‘मुमताज ताजमहल’ की मृत्यु हो गई, तो उसके तकरीबन दो साल बाद तक शाहजहां शोक में रहे और तमाम ऐश-ओ -आराम छोड़ दिए थे। उन्हीं की याद में ताजमहल का निर्माण हुआ जिसे विश्व की तमाम इमारतों में सर्वाधिक भव्य और आकर्षक माना जाता है।

अपने दूसरे मुगल शासकों की तुलना में शाहजहां को एक सहिष्णु शासक के रूप में याद किया जाता है। हालांकि उसने अपने शासनकाल में इस्लाम को बढ़ावा दिया और शाहजहां के काल में ही गौ हत्या पर से बैन हटाया गया था। इतना ही नहीं, उस काल में मुस्लिम गुलाम रखने पर प्रतिबंध लगाया गया। इसी समय हिंदुओं की तीर्थ यात्रा पर कर भी लगा और कई हिंदू मंदिर तोड़े फोड़े गए।

हालांकि यह भी कहा जाता है कि अहमदाबाद में चिंतामणि मंदिर की मरम्मत कराए जाने की इजाजत भी शाहजहां के ही काल में मिली और उस के दरबार में जगन्नाथ, गंगा लहरी इत्यादि राज कवियों को उसने प्रश्रय दिया।

अपने जीवन के आखिरी दिनों में शाहजहां चाहता था कि उसका पुत्र ‘दारा शिकोह’ मुगल सिंहासन पर विराजमान हो लेकिन औरंगजेब ने शाहजहां के साथ वही किया जो उसने अपने पिता के साथ किया था।

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1658 में शाहजहां को आगरे के किले में औरंगजेब द्वारा कैद कर लिया गया था और अपने जीवन के आखिरी 8 साल शाहजहां द्वारा एक कैदी के रूप में गुजारा गया।

31 जनवरी 1666 को शाहजहां द्वारा इस दुनिया को अलविदा कह दिया गया और इस तरीके से स्थापत्य कला के स्वर्ण युग के नायक शाहजहां अपनी बनाई विश्व प्रसिद्ध इमारतों को छोड़कर इस दुनिया से रुखसत हो गया। आप इस बादशाह के बारे में क्या सोचते हैं कमेंट बॉक्स में अवश्य बताएं।

‘पृथ्वीराज चौहान’ की बेमिसाल कहानी

भारतवर्ष में एक से बढ़कर एक बेमिसाल योद्धा रहे हैं, जिन्होंने अपनी तलवार के दम पर इतिहास की धारा को ही मोड़ दिया है। पृथ्वीराज चौहान भी उन्हीं योद्धाओं में गिने जाते हैं, जिन्होंने अपने अद्भुत साहस से दुश्मनों को एक नहीं बार-बार धूल चटाई।

इतना ही नहीं, संभवतः वह इतिहास के पहले और आखिरी ऐसे योद्धा रहे हैं जिन्होंने बंदी बनाए जाने के बावजूद भी अपने दुश्मन ‘मोहम्मद गौरी’ को उसके दरबार में ही मार गिराया।

आइए जानते हैं इस महानायक की कहानी…

1149 को पाटन गुजरात में जन्म लेने वाले पृथ्वीराज के पिता ‘सोमेश्वर चौहान’ तो माता का नाम कर्पूरा देवी था। कहा जाता है कि उनका जन्म कई देवताओं की पूजा – आराधना और मन्नत मांगने के बाद हुआ था। चूंकि शुरू से ही राज परिवार में पृथ्वीराज का जन्म हुआ था इसीलिए, उनके पालन-पोषण में कोई समस्या नहीं आयी।

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‘सरस्वती कण्ठाभरण विद्यापीठ’ से उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई तो उन्होंने अपने गुरु श्री राम जी से शस्त्र और युद्ध कला सीखी। उन्हीं से पृथ्वीराज चौहान ने ‘शब्दभेदी’ बाण चलाने की अनुपम कला सीखी थी। मतलब वह सिर्फ आवाज सुनकर ऐसे बाण चला सकते थे जिससे बोलने वाला व्यक्ति निशाना बन जाता था।

उनकी यही कला उनके जीवन के अंतिम दिनों में काम आयी।

पृथ्वीराज चौहान के बचपन से ही उनके पिता सोमेश्वर के खिलाफ साजिश रची गई और 11 साल की उम्र तक आते-आते एक युद्ध में उनके पिता की मौत हो गई। इसके बाद वह अजमेर के उत्तराधिकारी बने और अजमेर पर अपना सिक्का जमा लिया। उनकी मां चूंकि अपने पिता अनंगपाल की एकलौती बेटी थीं, इसीलिए पृथ्वीराज चौहान की प्रतिभा को देखते हुए अनंगपाल में उन्हें दिल्ली का शासक बनाने का प्रस्ताव रखा।

पृथ्वीराज चौहान के नाना अनंगपाल की मौत 1166 में हुई जिसके बाद दिल्ली के राज सिंहासन पर पृथ्वीराज चौहान बैठे। फिर तो उन्होंने दिल्ली पर अपना सिक्का जमा लिया।

कई वीरता के कार्य करने के पश्चात पृथ्वीराज चौहान और राजकुमारी संयोगिता की प्रेम कहानी का प्रसंग आता है। इस पर कई सारी फिल्में और टेलीविजन सीरियल भी बने हैं। मात्र तस्वीरों के सहारे दोनों एक दूसरे से प्रेम करने लगे थे और एक दूसरे को पत्राचार के माध्यम से अपनी भावनाएं बताने लगे थे।

कहा जाता है कि संयोगिता के पिता राजा ‘जयचंद’ एक महत्वाकांक्षी राजा थे और उन्होंने संपूर्ण भारत पर अपना प्रभुत्व जमाने के लिए अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया था।

इस आयोजन और राजा जयचंद की महत्वाकांक्षा का पृथ्वीराज चौहान ने विरोध किया था, जिसके फलस्वरुप जयचंद उनके प्रति घृणात्मक भाव रखने लगे थे।

जयचंद ने अपनी बेटी के स्वयंवर में पृथ्वीराज चौहान को आमंत्रित नहीं किया और उन्हें अपमानित करने के लिए अपने राज्य के द्वारपालों की जगह पर पृथ्वीराज चौहान की तस्वीरों का इस्तेमाल किया।

इसी समय पृथ्वीराज चौहान ने एक योजना बनाई, जब संयोगिता वरमाला लेकर कई राजाओं के पास से गुजर रही थीं, तभी पृथ्वीराज चौहान की मूर्ति जो उनके पिता द्वारा ही उनका अपमान करने के लिए लगाई गई थी, उसके गले में संयोगिता ने वरमाला डाल दिया।

यह देखकर तमाम राजा अपमानित महसूस करने लगे।

पृथ्वीराज चौहान अपनी योजना के मुताबिक द्वारपाल की प्रतिमा के ठीक पीछे खड़े थे और जैसे ही संयोगिता ने उनकी मूर्ति के गले में वरमाला डाला वैसे ही सबके सामने उन्होंने संयोगिता को उठाया और सबको ललकारते हुए संयोगिता को लेकर दिल्ली आ गए। राजा जयचंद ने अपनी सेना सहित उनका पीछा किया लेकिन पृथ्वीराज चौहान का बाल भी बांका नहीं हुआ।

हालांकि दोनों के बीच शत्रुता अवश्य बढ़ गई और 1189 से 1190 ई. में भयंकर लड़ाई हुई दोनों सेनाओं के बीच। चूंकि पृथ्वीराज चौहान एक कुशल सेनानायक थे और उनकी सेना में 3 लाख से अधिक सैनिकों के साथ-साथ हाथी और घोड़ों की विशाल संख्या थी, इसीलिए जयचंद सहित दूसरे राजपूत योद्धा उनका कुछ नहीं बिगाड़ सके।

इधर पृथ्वीराज की महत्वाकांक्षा भी बढ़ रही थी और वह पंजाब में अपना राज्य विस्तृत करना चाह रहे थे। उस वक्त पंजाब में मोहम्मद शहाबुद्दीन गोरी शासन कर रहा था।

अपनी सेना के साथ पृथ्वीराज ने मोहम्मद गौरी पर आक्रमण किया और सरहिंद, सरस्वती, हांसी आदि जगहों पर अपना राज्य कायम कर लिया। हालांकि अनहिलवाड़ा में मोहम्मद गोरी की सेना ने पृथ्वीराज पर जो हमला किया, तब उनका सैन्य बल कमजोर पड़ गया और सरहिंद का किला उनके हाथ से जाता रहा।

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इसके बाद हुई लड़ाई में मोहम्मद गौरी पृथ्वीराज चौहान से हार गया और उसे भागना पड़ा। इस युद्ध को ‘तराइन का युद्ध’ कहा जाता है।

कहा जाता है कि इसके बाद मोहम्मद गोरी ने कई बार पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण किया और बार-बार पृथ्वीराज ने उसे जीवित छोड़ दिया। कई बार हारने के बाद पृथ्वीराज चौहान के खिलाफ मोहम्मद गौरी प्रतिशोधात्मक भावना से भरता चला गया और बाद में उसने जयचंद से हाथ मिला लिया।

दोनों ने मिलकर 1192 में पृथ्वीराज चौहान को फिर से तराइन के मैदान में ललकारा और इस युद्ध में किसी भी राजपूत राजा ने पृथ्वीराज की मदद नहीं की क्योंकि पहले से ही वह सब उनसे जलन रखते थे।

कहा जाता है कि जयचंद की एक टुकड़ी ने योजनाबद्ध तरीके से पृथ्वीराज का साथ देने का छलावा किया और उनकी सेना में मिल गई। पृथ्वीराज चौहान जयचंद की चाल को नहीं समझ पाए और यहीं पर उस सैन्य टुकड़ी ने फंसा कर पृथ्वीराज चौहान को बंधक बना लिया और इस तरीके से मोहम्मद गोरी चंदबरदाई के साथ पृथ्वीराज चौहान को अपने साथ अफगानिस्तान ले गया।

पृथ्वीराज चौहान को बंधक बनाने के बाद उन्हें कई शारीरिक यातनाएं दी गयीं और गोरी उन्हें मुस्लिम बनने के लिए मजबूर करने लगा, लेकिन पृथ्वीराज… पृथ्वीराज थे!
वो जरा भी नहीं डिगे!

अपने अमानवीय कृत्यों को आगे बढ़ाते हुए मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज की आंखें जला दी। इतने पर भी उसका मन नहीं भरा तो उसने पृथ्वीराज को जान से मारने का फैसला किया।

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इससे पहले कि वह पृथ्वीराज की जान लेता, पृथ्वीराज के मित्र चंदबरदाई ने पृथ्वीराज की अनोखी कला शब्दभेदी बाण के बारे में बताया। मोहम्मद गौरी को इस पर विश्वास नहीं हुआ और उसने उसे देखने का फैसला किया।

उसे यकीन नहीं हुआ कि एक अंधा भला किस प्रकार से बाण चला सकता है?

मोहम्मद गौरी पृथ्वीराज और उनके दोस्त की इस जाल में फंस गया और पृथ्वीराज चौहान ने अपने दोस्त के दोहे की मदद से मोहम्मद गोरी को मौत के घाट उतार दिया। वह दोहा था-

चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण
ता उपर सुल्तान है,मत चूको चौहान।।

बाद में पृथ्वीराज और चंद्रवरदाई ने एक दूसरे को कटार भोक कर अपना बलिदान दे दिया और सदा सदा के लिए इतिहास में दोनों अमर हो गए।

मार्शल आर्ट के बादशाह ‘ब्रूस ली’ की कहानी

मार्शल आर्ट में जरा भी रुचि रखने वाले ‘ब्रूस ली’ को नहीं जानते होंगे ऐसा संभव ही नहीं है!
27 नवंबर 1940 को अमेरिका के एक चीनी परिवार में ब्रूस ली का जन्म हुआ था। इनकी शिक्षा-दीक्षा हांगकांग में हुई थी और कई विषयों की स्टडी के साथ-साथ ही ‘आत्मरक्षा पद्धति’ में इनको एक्सपर्ट माना जाता था।

मॉडलिंग की दुनिया का ऐसा कोई प्रोडक्ट नहीं है, जिसका विज्ञापन ब्रूस ली ने नहीं की हो। इनकी फिल्म ‘एंटर द ड्रैगन’ ज्यों ही रिलीज हुई, हॉलीवुड के मोस्ट फेवरेट और एक्सपेंसिव स्टार बन गए थे।

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यहां तक कि इस फिल्म का सेकंड पार्ट भी रिलीज हुआ। इसके अतिरिक्त ब्रूस ली की दूसरी फिल्में गेम आफ डेथ, द बिग बॉस इत्यादि ने भी बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त तहलका मचाया।

जैसा कि हमेशा होता है ‘एक व्यक्ति जब लोकप्रिय होना शुरू होता है, तब उसी अनुपात में उसके शत्रु भी बढ़ जाते हैं’। कराटे, बॉक्सिंग, मार्शल आर्ट, कुंग फू और जूडो का बेहतरीन जानकार होने के कारण पर्दे पर एक्शन करने में ब्रूस ली का कोई मुकाबला नहीं था।

इन कई कलाओं को मिलाकर ब्रूस ली ने एक नई आत्मरक्षा शैली का आविष्कार किया, जिसे ‘जीन कुने दो’ का नाम दिया गया।

साधारण शारीरिक फिटनेस वाले ब्रूस ली इतनी तेज गति से वार करते थे कि उसका कोई मुकाबला नहीं था। यहां तक कि कई बार कैमरे भी उनकी गति को पकड़ने में सक्षम नहीं होते थे। तकनीकी रूप से बात करें तो ब्रूस ली 30 मिनट या उससे अधिक समय तक एक ‘उच्च V-सिट’ स्थिति में बने रह सकते थे।

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इतना ही नहीं, चावल के छोटे दाने को ऊपर हवा में फेंक कर उन्हें बीच उड़ान में ही चॉपस्टिक से पकड़ने वाली ब्रूस ली की कला और उनका अभ्यास असाधारण था। इतना ही नहीं उनके नाम कई सारे रिकार्ड भी दर्ज हैं। ब्रूस ली अपने प्रहार से 90 किलो से अधिक बैग को उड़ा सकते थे और साइड किक से छत को ठोक सकते थे।

आखिर उन्हें ड्रैगन फ्लाई की उपाधि यूं ही नहीं दी गई थी।

अपने कारनामों से दुनिया भर में तहलका मचाने वाले और अपने फैंस को सरप्राइज करने वाले ब्रूस ली 20 जुलाई 1973 को मृत्यु को प्राप्त हो गए। उस वक्त वह अपने फीमेल फ्रेंड ‘बेट्टी टिंग पेई’ के यहां अपनी अगली फिल्म के बारे में प्लानिंग कर रहे थे।

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उनकी इस मौत से दुनिया भर में सनसनी फैल गई। इनकी मौत के सन्दर्भ में 3 सितंबर 1973 को हांग कांग गवर्नमेंट द्वारा एक इन्वेस्टिगेशन शुरू की गई। हालांकि कई सारी सनसनी रिपोर्ट के बावजूद ब्रूस ली की मौत कैसे हुई, यह आज भी एक रहस्य ही है।

दुनिया आज तक कई सितारों को पर्दे पर देखती आयी है और भूल जाती है, किंतु 45 साल से अधिक समय हो जाने के बावजूद भी ब्रूस ली की लोकप्रियता आज भी बरकरार है और एक्शन सीक्वेंस में उनके फैंस उन्हें आज भी याद करते हैं।

डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन: भारतवर्ष के महान शिक्षक

शिक्षकों के बिना कुछ भी संभव नहीं है! जिस प्रकार कुम्हार कच्ची मिट्टी को किसी बर्तन का आकार देता है, ठीक उसी प्रकार एक टीचर अपने स्टूडेंट को एक बेहतर इंसान, सफल इंसान बनने में मदद करता है।

भारतवर्ष में एक से बढ़कर एक महान शिक्षक हुए हैं और इन्हीं में से भारत के पूर्व राष्ट्रपति ‘डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन’ का नाम गिना जाता है।

5 सितंबर को समूचे भारत में ‘शिक्षक दिवस’ मनाया जाता है और यह डॉ. राधाकृष्णन के जन्मदिन के अवसर पर ही मनाया जाता है।

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जी हां 5 सितंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरुवनी गांव में जन्मे डॉ. राधाकृष्णन के पिताजी सर्वपल्ली ‘वीरस्वामी’ तो माता ‘सीता मां’ के नाम से जानी जाती थीं। ब्राह्मण परिवार में जन्मे डॉ. कृष्णन की माली हालत शुरुआत में ठीक नहीं थी और इस वजह से बचपन में उन्हें ज्यादा सुविधाएं नहीं मिली और गरीबी में इन्हें अपना गुजर-बसर करना पड़ा।

तत्कालीन समय में बाल-विवाह बहुत आम बात थी, इसलिए 16 साल की उम्र में ही इनका विवाह कर दिया गया था। बचपन से ही डॉ. कृष्णन एक मेधावी छात्र माने जाते थे। इनकी सीखने और चीजों को समझने की शक्ति बेहद तीक्ष्ण थी। उनका विवेक देखकर लोग आश्चर्यचकित होते थे। उनका परिवार तो चूंकि गरीब था, लेकिन अपनी मेधा के बल पर उन्होंने स्कॉलरशिप हासिल की और इस तरीके से उन्होंने हायर एजुकेशन हासिल किया।

1920 में उन्होंने मैट्रिक परीक्षा पास की तो ‘मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज’ से उन्होंने ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की। गणित, मनोविज्ञान और इतिहास में विशेषज्ञ के तौर पर उन्होंने पढ़ाई की। दर्शनशास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएट की उपाधि हासिल करके राधाकृष्णन 1918 ईस्वी में ‘मैसूर यूनिवर्सिटी’ में फिलासफी के प्रोफ़ेसर के रूप में कार्य करने लगे थे।

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1921 ईस्वी में कोलकाता यूनिवर्सिटी में इन्हें दर्शनशास्त्र का प्राध्यापक नियुक्त किया गया। बाद में अपने तीक्ष्ण विचारों और लेखों के माध्यम से पूरा भारत इनकी काबिलियत को पहचानने लगा था। बाद के दिनों में फिलासफी के प्रधान विद्वान के रूप में इनको ख्याति मिलनी शुरू हुई और इन्हें पूरे विश्व से यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में लेक्चर देने के लिए बुलाया जाने लगा।

यहां तक कि ‘ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी’ में इन्हें हिंदू दर्शन शास्त्र पर लेक्चर देने के लिए बुलाया गया। बाद में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में ही फिलासफी के प्रोफेसर के रूप में इन्हें नियुक्ति मिल गयी।

1931 ईस्वी में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन द्वारा आंध्र यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर का चुनाव लड़ा गया और 1939 से 1948 तक उन्होंने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के कुलपति के रूप में सेवाएं दीं।

देश के आजाद होने के बाद सोवियत संघ के साथ राजनयिक कार्यों के लिए इन्हें भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा विशिष्ट राजदूत के रूप में नियुक्त किया गया। 2 साल तक इन्होंने इस पद पर काम किया और आजादी के तकरीबन 5 साल बाद हमारे देश के प्रथम उपराष्ट्रपति बने।

13 मई 1962 को डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के दूसरे राष्ट्रपति के रूप में नियुक्त किए गए और उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया।

एक शिक्षक के रूप में न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व में अपनी पहचान रखने वाले डॉक्टर राधाकृष्णन के महान विचार कई किताबों में संकलित हैं जिनमें ‘द रेन ऑफ़ कंटम्परेरी फिलासफी, द फिलासफी ऑफ़ रवीन्द्रनाथ टैगोर, द एथिक्स ऑफ़ वेदांत, ईस्ट एंड वेस्ट-सम रिफ्लेक्शन्स और इंडियन फिलोसोफी जैसी पुस्तकें गिनाई जा सकती हैं।

बात के दिनों में डॉ राधाकृष्णन को भारत रत्न के पुरस्कार से नवाजा गया और भारत से बाहर जर्मन बुक ट्रेड के शांति पुरस्कार, ब्रिटिश ऑर्डर ऑफ मेरिट सम्मान और अमेरिकी सरकार द्वारा ‘टेम्प्लेटों’ पुरस्कार इत्यादि से सम्मानित किया गया।

17 अप्रैल 1975 को डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की मृत्यु हो गई, लेकिन अपनी मृत्यु से पहले शिक्षा की महत्ता बताने में अपना पूरा जीवन खपा दिया। 5 सितंबर को राधाकृष्णन दिवस या शिक्षक दिवस मनाया जाने से हम समझ सकते हैं कि डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का हमारे जीवन में क्या योगदान है।

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शिक्षा के बारे में वह कहते हैं कि ‘ज्ञान हमें आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करता है, जबकि प्रेम हमें परिपूर्णता प्रदान करता है’। शिक्षा के बारे में उनकी कई कोटेशंस हैं, जो आज भी लोगों को रास्ता दिखाते हैं, उनका मार्गदर्शन करते हैं।

सिखों के महान ‘गुरु गोविंद सिंह’ के बारे में कितना जानते हैं?

भारतवर्ष का इतिहास त्याग और तपस्या से भरा रहा है और यहां पर धर्म की रक्षा की खातिर लोगों ने अपने प्राण बलिदान करने में एक पल की भी देरी नहीं की है।

संभवतः उन्हीं के बलिदानों का परिणाम है कि हम आज एक लोकतांत्रिक देश के रूप में अपनी गरिमा कायम रखे हुए हैं। इसी कड़ी में आज हम बात करेंगे, गुरु गोविंद सिंह के बारे में, जिन्हें सिखों का दसवां ‘धार्मिक गुरू’ माना जाता है।

हालांकि गुरु गोविंद सिंह को सिर्फ धार्मिक गुरु कहना उनकी प्रतिभा और उनके कद के साथ अन्याय करना होगा। बल्कि वह एक महान दार्शनिक, सुप्रसिद्ध कवि, एक बड़े योद्धा और अनुभवी लेखक होने के साथ-साथ संगीत और कला के बड़े पारखी भी माने जाते थे।

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मात्र 9 साल की उम्र में उन्होंने अपने पिता की गद्दी संभाल ली और सिखों के गुरु बने। तत्कालीन समय में समाज मुस्लिम आतताईयों द्वारा पीड़ित था और इसी के खिलाफ गुरु गोविंद सिंह ने बड़ा विद्रोह किया, जिसे सिक्ख इतिहास की महत्वपूर्ण घटना माना जाता है। 5 जनवरी 1666 ईस्वी को पटना साहिब में जन्मे गुरु गोविंद सिंह के पिता ‘गुरु तेग बहादुर’ तो माता का नाम ‘गुजरी देवी’ था।

जन्म के बाद तकरीबन 4 साल तक वह पटना में ही रहे। उनका जन्म स्थान तख्त ‘श्री पटना हरमंदिर साहिब’ के नाम से संपूर्ण विश्व में विख्यात है। 4 साल के होने के बाद वह अपने परिवार के साथ पंजाब आए और 6 साल की उम्र के बाद वह हिमालय के शिवाली घाटी में स्थित ‘चक्क ननकी’ में रहने लगे। इस स्थान को आज ‘आनंदपुर साहिब’ के नाम से जाना जाता है।

गुरु गोविंद सिंह अपने बचपन से ही योद्धा बनने की राह पर बढ़ चले थे और इसके लिए उन्होंने तीरंदाजी, मार्शल आर्ट, अस्त्र-शस्त्र चलाने की दूसरी कलाएं पूरे मन से सीखीं। इतना ही नहीं एक अच्छे नेतृत्वकर्ता के गुणों में लोगों से संवाद करने की कला को भी उन्होंने बखूबी विकसित किया और पंजाबी, मुगली, फारसी, ब्रज और संस्कृत भाषाओं पर अच्छी कमांड हासिल की। कहा जाता है कि तब के समय में कश्मीरी पंडितों पर मुगल शासकों ने जबरदस्त जुल्म ढाए थे।

जब कश्मीरी पंडित गुरु गोविंद सिंह के पिता गुरु तेग बहादुर के पास मदद मांगने आये, तब गुरु तेग बहादुर ने यह कहा कि किसी बड़े धर्मात्मा को बलिदान देना होगा।

तब नन्हें बालक गुरु गोविंद सिंह ने कहा कि आप से बड़ा धर्मात्मा इस संसार में कौन है?

अपने बालक के वचन को सुनकर गुरु तेग बहादुर ने कश्मीरी पंडितों के लिए अपना बलिदान कर दिया और इस तरीके से इस्लाम स्वीकारने से तमाम पंडितों को बचा लिया। तब औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर का चांदनी चौक में सर कलम करा दिया था।

अपने पिता के त्याग और बलिदान को देखते हुए ही गुरु गोविंद सिंह बड़े हुए थे। अपने पिता के बलिदान के बाद उन्होंने सिक्खों की गद्दी संभाली।

गद्दी संभालने के बाद से ही अत्याचार और अन्याय के खिलाफ गुरु गोविंद सिंह की आवाज बुलंद होती चली गई। उन्होंने महान योद्धाओं की मजबूत सेना बनाई और 1699 ईस्वी में ‘खालसा पंथ’ की स्थापना की। बलिदान की भावना से प्रेरित करके आम लोगों की सेना किस तरीके से बनाई जाती है, इसका उदाहरण गुरु गोविंद सिंह के अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं मिलता है।

पांच मूल सिद्धांतों के आधार पर खालसा पंथ स्थापित हुआ और यह पांच सिद्धांत ‘‘5 ककार’ कहलाये। इनमें प्रत्येक का पालन करना अनिवार्य होता है, जिसमें एक लकड़ी की कंघी होती है जो साफ सफाई और स्वच्छता के रूप में खुद के पास रखनी होती है।

इसी प्रकार से कड़ा या कारा हाथ में धातु का एक कंगन होता है, कचेरा यानी कपास का कच्छा जो घुटने तक आने वाला एक अंतर्वस्त्र है।

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चौथा केश है जिसे तमाम गुरु और ऋषि मुनि धारण करते आए हैं, इसलिए सच्चे सिक्खों को बाल ना कटाने के बारे में भी गुरु गोविंद सिंह ने सीख दी। इसी प्रकार पांचवा कृपाण या कटी हुई घुमावदार तलवार भी प्रत्येक सिक्ख को धारण करना अनिवार्य किया गया।

गुरु गोविंद सिंह ने जिस तरीके से सिक्खों का नेतृत्व किया, वह अपने आप में बेमिसाल है। कहा जाता है कि अपने जीवन काल में गुरु गोविंद सिंह में 14 बड़ी लड़ाइयां लड़ी जिसमें न केवल बहादुर सैनिक बलिदान हुए बल्कि गुरु गोविंद सिंह को अपने पुत्रों तक का बलिदान करना पड़ा।

इन लड़ाईयों में ‘भंगानी’ की लड़ाई जो 1688 में हुई, इसके बाद ‘नंदौन’ की लड़ाई 1691 में हुई। गुलेर की लड़ाई 1696 में तो आनंदपुर का पहला युद्ध 1700 में हुआ था। इसके अतिरिक्त 1702 ईसवी में ‘निर्मोहगढ़’ और ‘बसौली’ का 2 युद्ध हुआ था तो 1740 में भी ‘चमकौर’ आनंदपुर और सरसा की तीन बड़ी लड़ाइयां हुई थीं।

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1705 ई. में ‘मुक्तसर’ का भयंकर युद्ध हुआ था। जाहिर तौर पर गुरु गोविंद सिंह अत्याचारी के ख़िलाफ़ आजीवन ही युद्ध करते रहे और इस तरीके से 7 अक्टूबर 1708 ईस्वी को महाराष्ट्र के ‘नांदेड़ साहिब’ में गुरु गोविंद ने आखिरी सांस ली।

अपने जीवन में जीवों पर दया करना, प्रेम, भाईचारे से रहना और समाज और गरीब वर्ग का उत्थान करने की सीख उन्होंने अपने शिष्यों को दी। गुरु गोविंद सिंह द्वारा तमाम ऋषि-मुनियों और अपने पूर्वजों के वचनों को गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित किया गया।

इसी के आधार पर सिक्ख आगे की दिशा की ओर बढे। ऐसे महापुरुष को इतिहास सदा सदा के लिए नमन करता है।

भारत का एक सामान्य लड़का कैसे बना ‘गूगल’ का सर्वेसर्वा?

भारत में लीडर्स की कमी नहीं रही है। लीडर से यहाँ मतलब सिर्फ राजनीतिक लीडर्स से नहीं है। बल्कि व्यापार से लेकर टेक्नोलॉजी, साहित्य से लेकर विज्ञान तक भारतीय लीडर्स ने अपनी प्रतिभा का लोहा हर बार मनवाया है।

आधुनिक युग में भी भारतीय पृष्ठभूमि के तमाम युवक वैश्विक परिदृश्य पर अपनी चमक बिखेरने में कहीं से भी पीछे नहीं हैं। दुनिया की सबसे सक्षम और उपयोगी टेक्नोलॉजी कंपनी मानी जाने वाली गूगल के सीईओ के रूप में ‘सुंदर पिचाई’ भी ऐसे ही एक बड़े नाम हैं।

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12 जुलाई 1972 को चेन्नई में एक आम परिवार में जन्मे ‘सुंदर पिचाई’ बचपन से ही प्रतिभाशाली स्टूडेंट रहे हैं। वह अपने क्लास के टॉपर स्टूडेंट में हमेशा ही गिने जाते थे। ना केवल पढ़ाई बल्कि खेलकूद में भी उनकी प्रतिभा का लोहा बचपन से ही माना गया है।

12वीं तक की पढ़ाई उन्होंने चेन्नई के वाना-वाणी स्कूल से की और अपनी प्रतिभा के बल पर उन्होंने मात्र 17 साल की उम्र में ‘आईआईटी खड़कपुर’ में दाखिला ले लिया। अपने टॉपर बनने की आदत को उन्होंने आईआईटी में भी बरकरार रखा और अपने बैच में टॉप करके उन्होंने रजत पदक हासिल किया।

बाद में उन्हें स्कॉलरशिप मिली और ‘स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी’ अमेरिका से उन्होंने अपने एमएस की पढ़ाई पूरी की। बाद में ‘वॉर्टन यूनिवर्सिटी’ से उन्होंने मास्टर इन बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में एडमिशन लिया और उसे भी पूरा किया।

2004 में सुंदर पिचाई ने गूगल ज्वाइन किया था और एक प्रोडक्ट और इनोवेशन ऑफिसर के रूप में गूगल टूल बार और सर्च में उन्होंने अपना लोहा मनवाया। एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम के डेवलपमेंट के साथ-साथ 2008 में जब गूगल क्रोम लांच हुआ, उसमें भी सुंदर पिचाई की महत्वपूर्ण भूमिका निर्धारित थी।

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अपनी क्षमता से गूगल के सीनियर्स का विश्वास वह लगातार जीतते गए और इस मल्टीनेशनल कंपनी ने जल्द ही सुंदर पिचाई को ‘सीनियर वाइस प्रेसिडेंट’ की जिम्मेदारी सौंप दी। 2013 में जब एंड्राइड बनाने वाले ‘ऐंडी रूबीन’ द्वारा प्रोजेक्ट छोड़ दिया गया तब सुंदर पिचाई ने इस प्रोजेक्ट को हैंडल करना शुरू किया।

अपनी स्किल द्वारा गूगल के निवेशकों में वह अपना भरोसा लगातार बढ़ाते जा रहे थे और जल्द ही उन्हें गूगल के तमाम प्रोडक्ट्स का हेड बना दिया गया।

इन प्रोडक्ट्स में न केवल गूगल सर्च बल्कि गूगल मैप, गूगल प्लस, गूगल कॉमर्स, गूगल ऐड जैसे तमाम प्रोडक्ट शामिल थे। 2015 में उनके विजन के कारण उन्हें कंपनी का सीईओ बना दिया गया और भारत के लोग उन पर गर्व करने लगे।

क्योंकि 400 अरब डालर से अधिक का कारोबार करने वाली अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के टॉप ऑफिसर के रूप में सुंदर पिचाई ने भारत का और भारतवासियों का मान निश्चित रूप से बढ़ाया।

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सबसे बड़ी बात है कि गूगल के सीईओ के रूप में सुंदर पिचाई ने अपनी भारतीय पहचान कायम रखी है। वह चाहे उनके पहनावे की बात हो या फिर भारत से जुड़ाव की ही बात क्यों ना हो, उन्होंने कभी भी भारतीय पहचान से खुद को दूर करने की कोशिश नहीं की।

यहां तक कि क्रिकेट का मैच हो या फिर दूसरी गतिविधियां सुंदर पिचाई भारत और भारतीयता से ओतप्रोत नज़र आते हैं।