एक तांगे चलाने वाला व्यक्ति दुनिया भर में अपने ब्रांड की पकड़ बनाता है और उसे बनाए रखता है! पर महाशय जी के बारे में सिर्फ यही बात खास नहीं है बल्कि खास बात यह है कि यह उन्होंने वर्तमान समय में नहीं किया जब स्टार्टअप के लिए तमाम इकोसिस्टम उपलब्ध हैं, बल्कि यह उन्होंने आजादी के बाद उस दौर में कर दिखाया जब लोग अपनी रोजी-रोटी तक के लिए संघर्ष करते थे वह भी बंटवारे का दंश झेलने के बाद।

महाशय धर्मपाल गुलाटी जी की खासियत यहां तक भी नहीं रुकती बल्कि उन्होंने मार्केटिंग के जमाने में किसी चमकदार बोलीवुडीये चेहरे को हायर करने की बजाय खुद को ही अपने ब्रांड का एंबेसडर बनाया और इसमें वह पूरी तरह सफल रहे। महाशय जी की खासियत इतनी भी नहीं है बल्कि 90 वर्ष से अधिक उम्र में जब किसी के लिए ठीक से चलना भी मुश्किल होता है, तब महाशय जी अपनी कंपनी का समस्त कामकाज संभालने के साथ-साथ तमाम सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी भी रखते हैं, धर्म के तमाम कार्यों से लेकर सामाजिक रूप से जुड़ाव बरकरार रखते हैं।
ज़ाहिर है कि महाशय जी खुद को एक अद्भुत बिजनेस लीडर साबित कर चुके हैं।

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1923 में जब पाकिस्तान के सियालकोट में धर्मपाल गुलाटी का जन्म हुआ था तब उनके पिता की मसालों की एक दुकान थी। उस वक्त परिवार की हालत कुछ ठीक न थी, इसीलिए महाशय जी में पांचवी के बाद स्कूल जाना छोड़ दिया और पिता की मदद करने लगे। पहले उन्होंने शीशे का व्यापार किया, फिर कारपेंटर, हार्डवेयर इत्यादि का व्यापार किया लेकिन कोई व्यापार सफल नहीं हुआ।

अंत में उन्होंने महाशय दी हट्टी के नाम से “देगी मिर्च वाले”बनकर व्यापार शुरू किया। परिवार का गुजारा होने लगा, तभी देश बंटवारे की तरफ बढ़ गया। बंटवारे में उन्हें सब कुछ छोड़ कर भारत आना पड़ा और अमृतसर के रिफ्यूजी कैंप में उन्होंने शुरुआती दिन बिताए। बाद में अमृतसर से निकलकर वह दिल्ली आ गए और मात्र 1500 रूपयों के साथ उन्होंने एक तांगा खरीदा।

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कनॉट प्लेस से करोल बाग तक यह महान शख्सियत तांगा चलाया करती थी और कुछ ज्यादा आमदनी ना होने के कारण फिर उन्होंने मसालों का व्यापार पुनः शुरू करने का निर्णय लिया।

इस तरह महाशय धर्मपाल गुलाटी ने अजमल खान रोड पर अपनी छोटी सी मसालों की दुकान खोली और उसके बाद अपनी शुद्धता से वह लगातार ग्राहकों को आकर्षित करते चले गए।

दिल्ली में सियालकोट वाले धर्मपाल जी का नाम बड़ी तेजी से ख्याति प्राप्त करने लगा और तब 1959 में कीर्ति नगर में महाशय दी हट्टी का नाम बदलकर एमडीएच के नाम से उन्होंने फैक्ट्री डाल दी। तमाम मशीनें आईं और एमडीएच की खासियत यह रही कि उन्होंने अपने मसालों में कोई मिलावट नहीं की।

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समझना मुश्किल नहीं है कि आखिर 50 प्रकार के मसाले न केवल भारत में बल्कि एमडीएच का ब्रांड जापान, स्वीटजरलैंड, अमेरिका इत्यादि तमाम देशों में क्यों पापुलर है?

वस्तुतः महाशय जी ने कभी भी मार्केटिंग के जमाने में कोई भी चीज “ओवर सेल” नहीं करी, उन्होंने चीजों को बढ़ा चढ़ाकर नहीं दिखाया, बल्कि बड़े ही सादे तरीके से वह अपने प्रोडक्ट्स की ब्रांडिंग खुद ही करते थे। इस प्रकार से आने वाले समय के लिए युवाओं को प्रेरणा देने का वह सबसे बड़ा स्रोत बन गए। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि उनकी मौत की कई बार अफवाहें उड़ी, लेकिन महाशय जी पूरी तरह से चुस्त-दुरुस्त-तंदुरुस्त हैं। अपनी कंपनी के तमाम कार्य वह खुद करते हैं और नीतिगत फैसलों पर अपना निर्णय सुनाते हैं।

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इस अद्भूत और महान बिजनेस लीडर की कहानी आपको कैसी लगी कमेंट बॉक्स में अवश्य बताएं।

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