6 जून को भारतीय सेना ने ऑपरेशन ब्लूस्टार को अंजाम दिया था। ऑपरेशन ब्लू स्टार के बारे में आप सब ने जरूर सुना होगा, क्योंकि इसी ऑपरेशन के कारण भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हुई और इसी ऑपरेशन के कारण समूचे देश में सिख विद्रोही दंगे भड़क उठे थे। ऐसे में प्रश्न उठता है कि जनरल बरार कौन थे और उन्होंने यह सब किया कैसे, आइए जानते हैं-

जनरल बरार का पूरा नाम कुलदीप सिंह बरार था और इनका जन्म पंजाब के ही एक सिख परिवार में हुआ था। उनका परिवार अच्छी हैसियत वाला परिवार था। संभवतः इसीलिए वह देहरादून के बोर्डिंग स्कूल से अपनी पढ़ाई पूरी कर सके थे। घर में माहौल सख्त था, क्योंकि बरार के पिताजी फौज में एक अफसर थे।

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कुलदीप अपने पिताजी से बेहद प्रेरित थे, क्योंकि उनके पिता ने सेकंड वर्ल्ड वार में बड़ा साहस दिखलाया था। इसी प्रेरणा के फलस्वरुप कुलदीप बरार भी 20 साल की उम्र में ही फौज में भर्ती हो गए और उन्हें मराठा लाइट इन्फेंट्री में लेफ्टिनेंट का पद मिला। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उन्हें बड़ी जिम्मेदारी दी गई थी, जिसमें वह इन्फेंट्री बटालियन को लीड कर रहे थे।

इस मिशन में वह कामयाब हुए थे और इसी के फलस्वरूप भारत सरकार ने वीर चक्र से उन्हें सम्मानित किया इसके अलावा भी उन्हें 1971 के वार में दूसरी जिम्मेदारियां भी मिलीं, जिसे उन्होंने बखूबी निभाया।

पंजाब की बात करें तो 1970 के दशक में अकाली एक स्वायत्त राज्य की मांग करने लगे थे, जिसके कारण पंजाब सुलगने लगा था। अकालियों की मांग से युवा पहले से ही उद्वेलित थे और इसका फायदा उठाया एक बेहद कठोर सरदार जनरैल सिंह भिंडरावाले ने। यह खुद को दमदमी टकसाल नामक शैक्षणिक संगठन का नेता बताता था और सरकार के प्रति इसने बेहद कड़ा रुख अपनाकर सिक्ख युवाओं को भड़काने का काम किया।

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फलस्वरूप पंजाब में हिंसा होने लगी और सिखों के अलावा दूसरी कम्युनिटी पर भिंडरवाले के लोग अत्याचार करने लगे। यह सारी परिस्थिति देख कर पंजाब में राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा कर दी गई और पंजाब में राष्ट्रपति शासन लग गया। उधर जनरैल सिंह भिंडरावाले ने भी आतंकी रास्ता अपनाते हुए अमृतसर के स्वर्ण मंदिर और अकाल तख्त कंपलेक्स पर कब्जा कर लिया था और इसी वजह से भारतीय सेना को ऑपरेशन ब्लू स्टार करना पड़ा।

जनरल कुलदीप सिंह बरार को इसकी जिम्मेदारी दी गई और उस वक्त जनरल मेरठ में एक बटालियन को लीड कर रहे थे। 1 महीने की छुट्टी के लिए उन्होंने अप्लाई किया था, लेकिन इस बीच छुट्टी कैंसिल हुई और मिला अमृतसर जाने का आदेश।

जनरल बरार उस स्थान पर पहुंचे और पूरे गुरुद्वारे के इर्द-गिर्द घूम कर उन्होंने वस्तु स्थिति समझने की कोशिश की। वह समझ गए थे कि आतंकवादियों ने जान-बूझकर स्वर्ण मंदिर परिसर का चुनाव किया है। आतंकी यह मान रहे थे कि लोगों की आस्था के कारण सेना स्वर्ण मंदिर में नहीं जाएगी।
पर जनरल तो फिर जनरल थे!

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जनरल बरार ने दोपहर तक आतंकवादियों को सरेंडर करने को कहा लेकिन आतंकवादी नहीं माने और आम जनता को बंधक बनाकर सरकार और सेना को ब्लैकमेल करने की कोशिश करने लगे।

बस फिर क्या था! सेना के पास कोई और रास्ता नहीं था और 5 जून की रात को 6 इनफैंड्री बटालियन के साथ जनरल बरार ने सेना को स्वर्ण मंदिर के अंदर घुसने का हुक्म दे दिया और जांबाज कमांडोज ने लोगों की आस्था का ध्यान रखते हुए इस सफल ऑपरेशन को अंजाम दिया।
इस ऑपरेशन के दौरान शाबेग सिंह और जनरैल सिंह भिंडरवाला मार गिराया गया। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि शाबेग सिंह खुद सेना के एक अधिकारी रहे थे और उन्होंने ही आतंकवादियों को ट्रेनिंग देने का राष्ट्रदोही निर्णय लिया था।

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जनरल बरार को ऑपरेशन ब्लू स्टार के लिए हमेशा सराहना मिली, लेकिन उनके ऊपर कई बार जानलेवा हमले किए गए, पर आतंकवादी मानसिकता के लोग इसमें कामयाब नहीं हो सके और सरकार ने उनकी निष्ठा और वीरता के लिए परम विशिष्ट सेवा मेडल से जनरल बरार को सम्मानित किया।

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