शिक्षकों के बिना कुछ भी संभव नहीं है! जिस प्रकार कुम्हार कच्ची मिट्टी को किसी बर्तन का आकार देता है, ठीक उसी प्रकार एक टीचर अपने स्टूडेंट को एक बेहतर इंसान, सफल इंसान बनने में मदद करता है।

भारतवर्ष में एक से बढ़कर एक महान शिक्षक हुए हैं और इन्हीं में से भारत के पूर्व राष्ट्रपति ‘डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन’ का नाम गिना जाता है।

5 सितंबर को समूचे भारत में ‘शिक्षक दिवस’ मनाया जाता है और यह डॉ. राधाकृष्णन के जन्मदिन के अवसर पर ही मनाया जाता है।

Pic: wikipedia

जी हां 5 सितंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरुवनी गांव में जन्मे डॉ. राधाकृष्णन के पिताजी सर्वपल्ली ‘वीरस्वामी’ तो माता ‘सीता मां’ के नाम से जानी जाती थीं। ब्राह्मण परिवार में जन्मे डॉ. कृष्णन की माली हालत शुरुआत में ठीक नहीं थी और इस वजह से बचपन में उन्हें ज्यादा सुविधाएं नहीं मिली और गरीबी में इन्हें अपना गुजर-बसर करना पड़ा।

तत्कालीन समय में बाल-विवाह बहुत आम बात थी, इसलिए 16 साल की उम्र में ही इनका विवाह कर दिया गया था। बचपन से ही डॉ. कृष्णन एक मेधावी छात्र माने जाते थे। इनकी सीखने और चीजों को समझने की शक्ति बेहद तीक्ष्ण थी। उनका विवेक देखकर लोग आश्चर्यचकित होते थे। उनका परिवार तो चूंकि गरीब था, लेकिन अपनी मेधा के बल पर उन्होंने स्कॉलरशिप हासिल की और इस तरीके से उन्होंने हायर एजुकेशन हासिल किया।

1920 में उन्होंने मैट्रिक परीक्षा पास की तो ‘मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज’ से उन्होंने ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की। गणित, मनोविज्ञान और इतिहास में विशेषज्ञ के तौर पर उन्होंने पढ़ाई की। दर्शनशास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएट की उपाधि हासिल करके राधाकृष्णन 1918 ईस्वी में ‘मैसूर यूनिवर्सिटी’ में फिलासफी के प्रोफ़ेसर के रूप में कार्य करने लगे थे।

Pic: wikipedia

1921 ईस्वी में कोलकाता यूनिवर्सिटी में इन्हें दर्शनशास्त्र का प्राध्यापक नियुक्त किया गया। बाद में अपने तीक्ष्ण विचारों और लेखों के माध्यम से पूरा भारत इनकी काबिलियत को पहचानने लगा था। बाद के दिनों में फिलासफी के प्रधान विद्वान के रूप में इनको ख्याति मिलनी शुरू हुई और इन्हें पूरे विश्व से यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में लेक्चर देने के लिए बुलाया जाने लगा।

यहां तक कि ‘ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी’ में इन्हें हिंदू दर्शन शास्त्र पर लेक्चर देने के लिए बुलाया गया। बाद में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में ही फिलासफी के प्रोफेसर के रूप में इन्हें नियुक्ति मिल गयी।

1931 ईस्वी में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन द्वारा आंध्र यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर का चुनाव लड़ा गया और 1939 से 1948 तक उन्होंने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के कुलपति के रूप में सेवाएं दीं।

देश के आजाद होने के बाद सोवियत संघ के साथ राजनयिक कार्यों के लिए इन्हें भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा विशिष्ट राजदूत के रूप में नियुक्त किया गया। 2 साल तक इन्होंने इस पद पर काम किया और आजादी के तकरीबन 5 साल बाद हमारे देश के प्रथम उपराष्ट्रपति बने।

13 मई 1962 को डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के दूसरे राष्ट्रपति के रूप में नियुक्त किए गए और उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया।

एक शिक्षक के रूप में न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व में अपनी पहचान रखने वाले डॉक्टर राधाकृष्णन के महान विचार कई किताबों में संकलित हैं जिनमें ‘द रेन ऑफ़ कंटम्परेरी फिलासफी, द फिलासफी ऑफ़ रवीन्द्रनाथ टैगोर, द एथिक्स ऑफ़ वेदांत, ईस्ट एंड वेस्ट-सम रिफ्लेक्शन्स और इंडियन फिलोसोफी जैसी पुस्तकें गिनाई जा सकती हैं।

बात के दिनों में डॉ राधाकृष्णन को भारत रत्न के पुरस्कार से नवाजा गया और भारत से बाहर जर्मन बुक ट्रेड के शांति पुरस्कार, ब्रिटिश ऑर्डर ऑफ मेरिट सम्मान और अमेरिकी सरकार द्वारा ‘टेम्प्लेटों’ पुरस्कार इत्यादि से सम्मानित किया गया।

17 अप्रैल 1975 को डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की मृत्यु हो गई, लेकिन अपनी मृत्यु से पहले शिक्षा की महत्ता बताने में अपना पूरा जीवन खपा दिया। 5 सितंबर को राधाकृष्णन दिवस या शिक्षक दिवस मनाया जाने से हम समझ सकते हैं कि डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का हमारे जीवन में क्या योगदान है।

Pic: dnaindia

शिक्षा के बारे में वह कहते हैं कि ‘ज्ञान हमें आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करता है, जबकि प्रेम हमें परिपूर्णता प्रदान करता है’। शिक्षा के बारे में उनकी कई कोटेशंस हैं, जो आज भी लोगों को रास्ता दिखाते हैं, उनका मार्गदर्शन करते हैं।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *