भारतवर्ष का इतिहास त्याग और तपस्या से भरा रहा है और यहां पर धर्म की रक्षा की खातिर लोगों ने अपने प्राण बलिदान करने में एक पल की भी देरी नहीं की है।

संभवतः उन्हीं के बलिदानों का परिणाम है कि हम आज एक लोकतांत्रिक देश के रूप में अपनी गरिमा कायम रखे हुए हैं। इसी कड़ी में आज हम बात करेंगे, गुरु गोविंद सिंह के बारे में, जिन्हें सिखों का दसवां ‘धार्मिक गुरू’ माना जाता है।

हालांकि गुरु गोविंद सिंह को सिर्फ धार्मिक गुरु कहना उनकी प्रतिभा और उनके कद के साथ अन्याय करना होगा। बल्कि वह एक महान दार्शनिक, सुप्रसिद्ध कवि, एक बड़े योद्धा और अनुभवी लेखक होने के साथ-साथ संगीत और कला के बड़े पारखी भी माने जाते थे।

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मात्र 9 साल की उम्र में उन्होंने अपने पिता की गद्दी संभाल ली और सिखों के गुरु बने। तत्कालीन समय में समाज मुस्लिम आतताईयों द्वारा पीड़ित था और इसी के खिलाफ गुरु गोविंद सिंह ने बड़ा विद्रोह किया, जिसे सिक्ख इतिहास की महत्वपूर्ण घटना माना जाता है। 5 जनवरी 1666 ईस्वी को पटना साहिब में जन्मे गुरु गोविंद सिंह के पिता ‘गुरु तेग बहादुर’ तो माता का नाम ‘गुजरी देवी’ था।

जन्म के बाद तकरीबन 4 साल तक वह पटना में ही रहे। उनका जन्म स्थान तख्त ‘श्री पटना हरमंदिर साहिब’ के नाम से संपूर्ण विश्व में विख्यात है। 4 साल के होने के बाद वह अपने परिवार के साथ पंजाब आए और 6 साल की उम्र के बाद वह हिमालय के शिवाली घाटी में स्थित ‘चक्क ननकी’ में रहने लगे। इस स्थान को आज ‘आनंदपुर साहिब’ के नाम से जाना जाता है।

गुरु गोविंद सिंह अपने बचपन से ही योद्धा बनने की राह पर बढ़ चले थे और इसके लिए उन्होंने तीरंदाजी, मार्शल आर्ट, अस्त्र-शस्त्र चलाने की दूसरी कलाएं पूरे मन से सीखीं। इतना ही नहीं एक अच्छे नेतृत्वकर्ता के गुणों में लोगों से संवाद करने की कला को भी उन्होंने बखूबी विकसित किया और पंजाबी, मुगली, फारसी, ब्रज और संस्कृत भाषाओं पर अच्छी कमांड हासिल की। कहा जाता है कि तब के समय में कश्मीरी पंडितों पर मुगल शासकों ने जबरदस्त जुल्म ढाए थे।

जब कश्मीरी पंडित गुरु गोविंद सिंह के पिता गुरु तेग बहादुर के पास मदद मांगने आये, तब गुरु तेग बहादुर ने यह कहा कि किसी बड़े धर्मात्मा को बलिदान देना होगा।

तब नन्हें बालक गुरु गोविंद सिंह ने कहा कि आप से बड़ा धर्मात्मा इस संसार में कौन है?

अपने बालक के वचन को सुनकर गुरु तेग बहादुर ने कश्मीरी पंडितों के लिए अपना बलिदान कर दिया और इस तरीके से इस्लाम स्वीकारने से तमाम पंडितों को बचा लिया। तब औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर का चांदनी चौक में सर कलम करा दिया था।

अपने पिता के त्याग और बलिदान को देखते हुए ही गुरु गोविंद सिंह बड़े हुए थे। अपने पिता के बलिदान के बाद उन्होंने सिक्खों की गद्दी संभाली।

गद्दी संभालने के बाद से ही अत्याचार और अन्याय के खिलाफ गुरु गोविंद सिंह की आवाज बुलंद होती चली गई। उन्होंने महान योद्धाओं की मजबूत सेना बनाई और 1699 ईस्वी में ‘खालसा पंथ’ की स्थापना की। बलिदान की भावना से प्रेरित करके आम लोगों की सेना किस तरीके से बनाई जाती है, इसका उदाहरण गुरु गोविंद सिंह के अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं मिलता है।

पांच मूल सिद्धांतों के आधार पर खालसा पंथ स्थापित हुआ और यह पांच सिद्धांत ‘‘5 ककार’ कहलाये। इनमें प्रत्येक का पालन करना अनिवार्य होता है, जिसमें एक लकड़ी की कंघी होती है जो साफ सफाई और स्वच्छता के रूप में खुद के पास रखनी होती है।

इसी प्रकार से कड़ा या कारा हाथ में धातु का एक कंगन होता है, कचेरा यानी कपास का कच्छा जो घुटने तक आने वाला एक अंतर्वस्त्र है।

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चौथा केश है जिसे तमाम गुरु और ऋषि मुनि धारण करते आए हैं, इसलिए सच्चे सिक्खों को बाल ना कटाने के बारे में भी गुरु गोविंद सिंह ने सीख दी। इसी प्रकार पांचवा कृपाण या कटी हुई घुमावदार तलवार भी प्रत्येक सिक्ख को धारण करना अनिवार्य किया गया।

गुरु गोविंद सिंह ने जिस तरीके से सिक्खों का नेतृत्व किया, वह अपने आप में बेमिसाल है। कहा जाता है कि अपने जीवन काल में गुरु गोविंद सिंह में 14 बड़ी लड़ाइयां लड़ी जिसमें न केवल बहादुर सैनिक बलिदान हुए बल्कि गुरु गोविंद सिंह को अपने पुत्रों तक का बलिदान करना पड़ा।

इन लड़ाईयों में ‘भंगानी’ की लड़ाई जो 1688 में हुई, इसके बाद ‘नंदौन’ की लड़ाई 1691 में हुई। गुलेर की लड़ाई 1696 में तो आनंदपुर का पहला युद्ध 1700 में हुआ था। इसके अतिरिक्त 1702 ईसवी में ‘निर्मोहगढ़’ और ‘बसौली’ का 2 युद्ध हुआ था तो 1740 में भी ‘चमकौर’ आनंदपुर और सरसा की तीन बड़ी लड़ाइयां हुई थीं।

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1705 ई. में ‘मुक्तसर’ का भयंकर युद्ध हुआ था। जाहिर तौर पर गुरु गोविंद सिंह अत्याचारी के ख़िलाफ़ आजीवन ही युद्ध करते रहे और इस तरीके से 7 अक्टूबर 1708 ईस्वी को महाराष्ट्र के ‘नांदेड़ साहिब’ में गुरु गोविंद ने आखिरी सांस ली।

अपने जीवन में जीवों पर दया करना, प्रेम, भाईचारे से रहना और समाज और गरीब वर्ग का उत्थान करने की सीख उन्होंने अपने शिष्यों को दी। गुरु गोविंद सिंह द्वारा तमाम ऋषि-मुनियों और अपने पूर्वजों के वचनों को गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित किया गया।

इसी के आधार पर सिक्ख आगे की दिशा की ओर बढे। ऐसे महापुरुष को इतिहास सदा सदा के लिए नमन करता है।

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