भारत की आजादी में एक से बढ़कर एक नेताओं का योगदान रहा है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि अगर इन नेताओं ने अपनी जान की बाजी लगाकर हमारे देश को आजाद नहीं कराया होता तो आज भी हम किसी अंग्रेज के घर गुलामी कर रहे होते।

अपने ऊपर आए कष्ट की परवाह किए बिना लाला लाजपत राय जैसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने हमारे भविष्य की चिंता की और तभी आज हम खुली हवा में सांस ले पा रहे हैं।

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लाला लाजपत राय ‘लाल-बाल-पाल‘ आजादी के नायकों की तिकड़ी में गिने जाते थे। लाल मतलब लाला लाजपत राय, बाल मतलब बाल गंगाधर तिलक और पाल मतलब बिपिन चंद्र पाल।

इस तिकड़ी से लाला लाजपत राय सच्चे देशभक्त होने के साथ-साथ बेहद हिम्मती क्रांतिकारी थे और एक अच्छे लीडर, अच्छे लेखक, वकील और समाज सुधारक के रूप में उनकी बड़ी ख्याति थी।

ब्रिटिश शासन के खिलाफ भाषण देने में उनका कोई मुकाबला नहीं था और देशभक्ति की भावना ने उन्हें ‘पंजाब केसरी’ / ‘पंजाब के शेर’ की उपाधि से विभूषित कराया था।

28 जनवरी 1865 को जन्मे लाला लाजपत राय के पिता श्री राधा कृष्ण जी और माता श्रीमती गुलाब देवी जी थीं। 1880 में कोलकाता और पंजाब यूनिवर्सिटी से इन्होंने अपनी पढ़ाई की तो 1886 में कानून की डिग्री ली।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, आर्य समाज और हिंदू महासभा से जुड़कर लाला लाजपत राय ने अपनी अद्वितीय नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया। पंजाब केसरी, यंग-इंडिया, भारत का इंग्लैंड पर ऋण, भारत के लिए आत्म निर्णय और तरुण भारत जैसी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने लोगों में अलख जगाने का कार्य किया।

आप यह जानकर हैरान रह जाएंगे कि लाला लाजपत राय द्वारा ही ‘पंजाब नेशनल बैंक’ और ‘लक्ष्मी बीमा कंपनी’ की नींव रखी गई थी। एक आर्य समाजी के रूप में भी लाला लाजपत राय हिंदू समाज में फैली कुरीतियों और धार्मिक अंधविश्वासों के खिलाफ झंडा बुलंद करते रहते थे।

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आर्य समाज के तत्कालीन संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती के साथ मिलकर उन्होंने कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष किया। आप यह जानकर हैरान रह जाएंगे कि इन्हें तत्कालीन समय में आर्य समाज की हिंदू संस्कृति के विरोधी के रूप में जाना जाता था।

हालाँकि लाला लाजपत राय ने आर्य समाज के लिए धन इकट्ठा करने से लेकर समाज में जागरूकता फैलाने तक अधिकतम योगदान दिया।

स्वतंत्रता संग्राम के लिए वह कई बार जेल भी गए तो प्रथम विश्व युद्ध के बाद ‘असहयोग आंदोलन’ में लाला लाजपत राय ने बढ़ चढ़कर भाग लिया और कई आंदोलनों का इन्होंने नेतृत्व किया। 1928 ईस्वी में ब्रिटिश सरकार द्वारा ‘साइमन कमीशन’ लाए जाने के विरोध में लाला लाजपत राय का प्रदर्शन उनके जीवन का आखिरी प्रदर्शन बना।

विभिन्न रैलियों में इन्होंने भाषण दिया, कई आयोजनों में चर्चा की और शांति पूर्वक मार्च भी निकाले। लेकिन साइमन कमीशन के लिए बने पैनल में एक भी भारतीय सदस्य के नहीं शामिल किए जाने के खिलाफ उन्होंने बड़ा आंदोलन किया।

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इसके फलस्वरूप ब्रिटिश गवर्नमेंट द्वारा लाठीचार्ज किया गया और इसी लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय को गहरी चोट लग गई। इस चोट के फलस्वरुप 17 नवंबर 1928 को लाला लाजपत राय सदा-सदा के लिए इस दुनिया को छोड़कर चले गए। हालांकि जाने से पहले उन्होंने आजादी के आंदोलन में अपनी आहुति सुनिश्चित कर दी थी।

उनका एक कथन बड़ा लोकप्रिय हुआ जिसके अनुसार वह कहते थे कि ‘मनुष्य अपने गुणों से आगे बढ़ता है ना कि दूसरों की कृपा से’।

इसी प्रकार कहा करते थे कि ‘मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश साम्राज्य के कफन में एक-एक कील साबित होगी’ ।

और अंततः उनका सपना साकार हुआ जब 15 अगस्त 1947 को अंग्रेज सदा सदा के लिए भारत को स्वतंत्र करके चले गए।

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