कहा जाता है कि अगर हम चैन की सांस ले रहे हैं तो यह सिर्फ उनकी बदौलत है जो सीमाओं पर हमारी रक्षा के लिए अनवरत खड़े हैं।

वह चाहे धूप हो, चाहे बरसात हो, चाहे बर्फ पड़ रही हो या फिर रेगिस्तान की गर्मी क्यों ना हो लेकिन हमारे महान नायक हमें 24 घंटे, साल के 365 दिन सुरक्षा प्रदान करने के लिए जान की बाजी लगाने को हरदम तैयार हैं।

इन लड़ाकों में से एक नाम है कैप्टन ‘विक्रम बत्रा’ का, जिन्होंने 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान अपनी जाबांजी से प्रत्येक भारतवासी को नतमस्तक कर दिया था। आप शायद यह नहीं जानते होंगे कि लाखों की मोटी सैलरी ठुकरा कर उन्होंने भारतीय सेना में जाने का विकल्प चुना था।

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आप शायद यह भी नहीं जानते होंगे कि अपनी शादी को टाल कर यह जांबाज़ देश पर शहीद हो गया।

1974 ईस्वी में पालमपुर में 9 सितंबर को विक्रम बत्रा का जन्म हुआ था। इनके साथ ही इनके जुड़वा भाई भी धरती पर आए। दोनों के बचपन का नाम लव और कुश था, जो बाद में विक्रम और विशाल के रूप से जाने गए। इनकी मां टीचर थीं, इसीलिए घर पर ही इनकी पढ़ाई शुरू की गई।

बाद में पालमपुर के सेंट्रल स्कूल में इनका दाखिला हुआ। विक्रम शुरू से ही क्लास में एक्टिव रहे और शिक्षकों के प्रिय भी रहे। चाहे पढ़ाई हो या स्पोर्ट्स ही क्यों ना हो, एक ऑलराउंडर के तौर पर स्कूल में हमेशा सबसे आगे रहे विक्रम। उनके स्कूल के पास आर्मी का ‘बेस-कैम्प’ था, इसीलिए उनके मन में शुरू से ही सेना में जाने का सपना पलने लगा था।

उनके पिता भी उन्हें सेना की वीरता के किस्से सुनाया करते थे। चंडीगढ़ के ‘डीएवी कॉलेज’ से उन्होंने साइंस में ग्रेजुएशन किया और इसी दौरान वह एनसीसी के बेस्ट कैडेट के रूप में चुने गए। इतना ही नहीं, उन्होंने गणतंत्र दिवस की परेड में हिस्सा लिया और अपने दोस्तों के बीच काफी पॉपुलर भी हुए।

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धीरे -धीरे उनके सेना में जाने की इच्छा और बढ़ने लगी थी, तो उनके दोस्त और उनका सर्कल भी उन्हें सेना में जाने के लिए प्रेरित करने लगा था। हालांकि उन्होंने मर्चेंट नेवी के लिए भी परीक्षा दी थीं और परीक्षा पास होने के बाद मर्चेंट नेवी से उनका जॉइनिंग लेटर भी आ गया।

वह ‘पोलैण्ड’ जाने के लिए रेडी हो गए थे, लेकिन अचानक विक्रम ने अपना सर झटका और मां की गोद में सर रखकर बोले कि उन्हें तो इंडियन आर्मी ही ज्वाइन करनी है।

लाखों रुपए की नौकरी वह ठुकरा चुके थे।

बाद में 1996 में इंडियन मिलिट्री एकेडमी देहरादून में वह सिलेक्ट हो गए और उनके बचपन का सपना एक तरह से पूरा हो गया था।

विक्रम की ट्रेनिंग के पूरा होने के बाद 6 दिसंबर 1997 को उन्हें जम्मू के सोपोर में ’13वीं जम्मू कश्मीर राइफल्स’ में लेफ्टिनेंट के पद पर ज्वाइनिंग मिल गयी। मात्र डेढ़ साल बाद ही 1999 में कारगिल की लड़ाई शुरू हो गई और विक्रम को इस लड़ाई के लिए जाना पड़ा। इस लड़ाई में उन्होंने ‘हम्प’ व ‘राकी’ नाब पर भारत का झंडा गाड़ा तो उन्हें कैप्टन की पदवी मिली।

फिर आगे बढ़ कर उन्होंने ‘श्रीनगर लेह’ के ऊपर 5140 चोटी को पाक सेना से मुक्त कराने का संकल्प लिया जो उस वक्त एक दुर्गम कार्य था। पर यह विक्रम बत्रा थे। बेहद ऊंची चोटी पर होने के बाद भी उन्होंने दुश्मन को ललकारते हुए अपने साथ लेफ्टिनेंट अनुज नैय्यर को लेकर पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया।

यह मिशन पूरा हो गया था और विक्रम बत्रा ‘दिल मांगे मोर’ के साथ आगे बढ़ने ही वाले थे, ठीक इसी समय अपने एक जूनियर लेफ्टिनेंट नवीन पर उनकी नजर गई। लेफ्टिनेंट नवीन युद्ध में घायल हो गए थे और विक्रम उन्हें अपने कंधे पर उठाकर आगे बढ़ ही रहे थे, तभी एक पाकिस्तानी सैनिक की गोली उनकी छाती में लग गई।

हालांकि गोली लगने के बावजूद भी विक्रम रुके नहीं और अपनी आखिरी सांस तक पाकिस्तानियों पर टूटते रहे।

अपने इस महान साहस के लिए विक्रम बत्रा को ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया गया। जाते-जाते यह योद्धा तिरंगे में लिपटने की अपनी अंतिम इच्छा को भी पूरी कर चुका था और साथ ही देशवासियों को नतमस्तक कर चुका था।

इस महान नायक की प्रेम-कहानी के बिना इसकी कहानी पूरी नहीं होगी। आप यह जानकर आश्चर्य करेंगे कि 1995 जब विक्रम अभी सेना में नहीं गए थे, तभी पंजाब यूनिवर्सिटी में ‘डिंपल’ नामक लड़की से उनका दिल लग गया था। लेकिन तभी 1996 में विक्रम आर्मी में सिलेक्ट हो गए थे और उन्हें अपना प्यार छोड़कर ड्यूटी पर जाना पड़ा।

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कारगिल लड़ाई के बाद लौटकर वह डिंपल से शादी करना चाहते थे, लेकिन कौन जानता था कि उनकी शादी और उनका सब कुछ देश बन चुका था। अपनी जान देकर विक्रम ने देश के प्रति अपने प्रेम को साबित भी किया।

आप इस महान नायक के बारे में क्या कहेंगे, कमेंट बॉक्स में अपने विचार अवश्य बताएं।

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