भारतवर्ष में एक से बढ़कर एक बेमिसाल योद्धा रहे हैं, जिन्होंने अपनी तलवार के दम पर इतिहास की धारा को ही मोड़ दिया है। पृथ्वीराज चौहान भी उन्हीं योद्धाओं में गिने जाते हैं, जिन्होंने अपने अद्भुत साहस से दुश्मनों को एक नहीं बार-बार धूल चटाई।

इतना ही नहीं, संभवतः वह इतिहास के पहले और आखिरी ऐसे योद्धा रहे हैं जिन्होंने बंदी बनाए जाने के बावजूद भी अपने दुश्मन ‘मोहम्मद गौरी’ को उसके दरबार में ही मार गिराया।

आइए जानते हैं इस महानायक की कहानी…

1149 को पाटन गुजरात में जन्म लेने वाले पृथ्वीराज के पिता ‘सोमेश्वर चौहान’ तो माता का नाम कर्पूरा देवी था। कहा जाता है कि उनका जन्म कई देवताओं की पूजा – आराधना और मन्नत मांगने के बाद हुआ था। चूंकि शुरू से ही राज परिवार में पृथ्वीराज का जन्म हुआ था इसीलिए, उनके पालन-पोषण में कोई समस्या नहीं आयी।

Pic: historydiscussion

‘सरस्वती कण्ठाभरण विद्यापीठ’ से उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई तो उन्होंने अपने गुरु श्री राम जी से शस्त्र और युद्ध कला सीखी। उन्हीं से पृथ्वीराज चौहान ने ‘शब्दभेदी’ बाण चलाने की अनुपम कला सीखी थी। मतलब वह सिर्फ आवाज सुनकर ऐसे बाण चला सकते थे जिससे बोलने वाला व्यक्ति निशाना बन जाता था।

उनकी यही कला उनके जीवन के अंतिम दिनों में काम आयी।

पृथ्वीराज चौहान के बचपन से ही उनके पिता सोमेश्वर के खिलाफ साजिश रची गई और 11 साल की उम्र तक आते-आते एक युद्ध में उनके पिता की मौत हो गई। इसके बाद वह अजमेर के उत्तराधिकारी बने और अजमेर पर अपना सिक्का जमा लिया। उनकी मां चूंकि अपने पिता अनंगपाल की एकलौती बेटी थीं, इसीलिए पृथ्वीराज चौहान की प्रतिभा को देखते हुए अनंगपाल में उन्हें दिल्ली का शासक बनाने का प्रस्ताव रखा।

पृथ्वीराज चौहान के नाना अनंगपाल की मौत 1166 में हुई जिसके बाद दिल्ली के राज सिंहासन पर पृथ्वीराज चौहान बैठे। फिर तो उन्होंने दिल्ली पर अपना सिक्का जमा लिया।

कई वीरता के कार्य करने के पश्चात पृथ्वीराज चौहान और राजकुमारी संयोगिता की प्रेम कहानी का प्रसंग आता है। इस पर कई सारी फिल्में और टेलीविजन सीरियल भी बने हैं। मात्र तस्वीरों के सहारे दोनों एक दूसरे से प्रेम करने लगे थे और एक दूसरे को पत्राचार के माध्यम से अपनी भावनाएं बताने लगे थे।

कहा जाता है कि संयोगिता के पिता राजा ‘जयचंद’ एक महत्वाकांक्षी राजा थे और उन्होंने संपूर्ण भारत पर अपना प्रभुत्व जमाने के लिए अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया था।

इस आयोजन और राजा जयचंद की महत्वाकांक्षा का पृथ्वीराज चौहान ने विरोध किया था, जिसके फलस्वरुप जयचंद उनके प्रति घृणात्मक भाव रखने लगे थे।

जयचंद ने अपनी बेटी के स्वयंवर में पृथ्वीराज चौहान को आमंत्रित नहीं किया और उन्हें अपमानित करने के लिए अपने राज्य के द्वारपालों की जगह पर पृथ्वीराज चौहान की तस्वीरों का इस्तेमाल किया।

इसी समय पृथ्वीराज चौहान ने एक योजना बनाई, जब संयोगिता वरमाला लेकर कई राजाओं के पास से गुजर रही थीं, तभी पृथ्वीराज चौहान की मूर्ति जो उनके पिता द्वारा ही उनका अपमान करने के लिए लगाई गई थी, उसके गले में संयोगिता ने वरमाला डाल दिया।

यह देखकर तमाम राजा अपमानित महसूस करने लगे।

पृथ्वीराज चौहान अपनी योजना के मुताबिक द्वारपाल की प्रतिमा के ठीक पीछे खड़े थे और जैसे ही संयोगिता ने उनकी मूर्ति के गले में वरमाला डाला वैसे ही सबके सामने उन्होंने संयोगिता को उठाया और सबको ललकारते हुए संयोगिता को लेकर दिल्ली आ गए। राजा जयचंद ने अपनी सेना सहित उनका पीछा किया लेकिन पृथ्वीराज चौहान का बाल भी बांका नहीं हुआ।

हालांकि दोनों के बीच शत्रुता अवश्य बढ़ गई और 1189 से 1190 ई. में भयंकर लड़ाई हुई दोनों सेनाओं के बीच। चूंकि पृथ्वीराज चौहान एक कुशल सेनानायक थे और उनकी सेना में 3 लाख से अधिक सैनिकों के साथ-साथ हाथी और घोड़ों की विशाल संख्या थी, इसीलिए जयचंद सहित दूसरे राजपूत योद्धा उनका कुछ नहीं बिगाड़ सके।

इधर पृथ्वीराज की महत्वाकांक्षा भी बढ़ रही थी और वह पंजाब में अपना राज्य विस्तृत करना चाह रहे थे। उस वक्त पंजाब में मोहम्मद शहाबुद्दीन गोरी शासन कर रहा था।

अपनी सेना के साथ पृथ्वीराज ने मोहम्मद गौरी पर आक्रमण किया और सरहिंद, सरस्वती, हांसी आदि जगहों पर अपना राज्य कायम कर लिया। हालांकि अनहिलवाड़ा में मोहम्मद गोरी की सेना ने पृथ्वीराज पर जो हमला किया, तब उनका सैन्य बल कमजोर पड़ गया और सरहिंद का किला उनके हाथ से जाता रहा।

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इसके बाद हुई लड़ाई में मोहम्मद गौरी पृथ्वीराज चौहान से हार गया और उसे भागना पड़ा। इस युद्ध को ‘तराइन का युद्ध’ कहा जाता है।

कहा जाता है कि इसके बाद मोहम्मद गोरी ने कई बार पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण किया और बार-बार पृथ्वीराज ने उसे जीवित छोड़ दिया। कई बार हारने के बाद पृथ्वीराज चौहान के खिलाफ मोहम्मद गौरी प्रतिशोधात्मक भावना से भरता चला गया और बाद में उसने जयचंद से हाथ मिला लिया।

दोनों ने मिलकर 1192 में पृथ्वीराज चौहान को फिर से तराइन के मैदान में ललकारा और इस युद्ध में किसी भी राजपूत राजा ने पृथ्वीराज की मदद नहीं की क्योंकि पहले से ही वह सब उनसे जलन रखते थे।

कहा जाता है कि जयचंद की एक टुकड़ी ने योजनाबद्ध तरीके से पृथ्वीराज का साथ देने का छलावा किया और उनकी सेना में मिल गई। पृथ्वीराज चौहान जयचंद की चाल को नहीं समझ पाए और यहीं पर उस सैन्य टुकड़ी ने फंसा कर पृथ्वीराज चौहान को बंधक बना लिया और इस तरीके से मोहम्मद गोरी चंदबरदाई के साथ पृथ्वीराज चौहान को अपने साथ अफगानिस्तान ले गया।

पृथ्वीराज चौहान को बंधक बनाने के बाद उन्हें कई शारीरिक यातनाएं दी गयीं और गोरी उन्हें मुस्लिम बनने के लिए मजबूर करने लगा, लेकिन पृथ्वीराज… पृथ्वीराज थे!
वो जरा भी नहीं डिगे!

अपने अमानवीय कृत्यों को आगे बढ़ाते हुए मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज की आंखें जला दी। इतने पर भी उसका मन नहीं भरा तो उसने पृथ्वीराज को जान से मारने का फैसला किया।

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इससे पहले कि वह पृथ्वीराज की जान लेता, पृथ्वीराज के मित्र चंदबरदाई ने पृथ्वीराज की अनोखी कला शब्दभेदी बाण के बारे में बताया। मोहम्मद गौरी को इस पर विश्वास नहीं हुआ और उसने उसे देखने का फैसला किया।

उसे यकीन नहीं हुआ कि एक अंधा भला किस प्रकार से बाण चला सकता है?

मोहम्मद गौरी पृथ्वीराज और उनके दोस्त की इस जाल में फंस गया और पृथ्वीराज चौहान ने अपने दोस्त के दोहे की मदद से मोहम्मद गोरी को मौत के घाट उतार दिया। वह दोहा था-

चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण
ता उपर सुल्तान है,मत चूको चौहान।।

बाद में पृथ्वीराज और चंद्रवरदाई ने एक दूसरे को कटार भोक कर अपना बलिदान दे दिया और सदा सदा के लिए इतिहास में दोनों अमर हो गए।

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