दुनिया में एक से बढ़कर एक गुरु (लीडर्स) हुए हैं जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में ना केवल छाप छोड़ी है, बल्कि वर्तमान से आगे भविष्य तक में अपने विचारों की गहराई से समाज को सकारात्मक ढंग से प्रभावित करने का कार्य किया है। इन्हीं नायकों में सिक्ख धर्म के प्रवर्तक ‘गुरु नानक देव’ जी का नाम आदर के साथ लिया जाता है।

इनके जीवन से संबंधित एक से बढ़कर एक कथाएं प्रचलित हैं, जो बताती हैं कि इन्होंने कितनी तन्मयता से और कितने साफ मन से समाज को राह दिखाने का कार्य किया।

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इनके एक नाम नहीं थे, बल्कि नानक शाह, बाबा नानक इत्यादि नाम भी इन्हीं के थे।आध्यात्मिक गुरु होने का मतलब यह कतई नहीं है कि उन्होंने अंधविश्वासों का समर्थन किया बल्कि अंधविश्वासों का उन्होंने सदा ही विरोध किया।

देश में एक कोने से दूसरे कोने तक और देश से बाहर मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया में उन्होंने अपनी यात्रा से अपने विचारों को प्रसारित करने का कार्य किया।

15 अप्रैल 1469 ईस्वी को रावी नदी के किनारे तलवंडी जो अब पाकिस्तान में है, वहां गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ था। इनके पिता कल्याण चंद जी को ‘मेहता कालू’ के नाम से जाना जाता था। वह स्थानीय प्रशासन में राजस्व के अधिकारी थे और इनकी माता तृप्ता देवी थीं। वहीं इनकी पत्नी सुलक्षिणी देवी थीं और इनके दो बच्चे श्रीचंद और लखमी दास थे। इनकी एक बहन नानकी देवी का भी जिक्र आता है।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इतना बड़ा पथ-प्रदर्शक और विचारक स्कूल से दूर ही रहा, क्योंकि उनका मन पढ़ाई लिखाई में नहीं लगता था। नानक देव सांसारिक विषयों के प्रति बहुत ज्यादा लगाव नहीं रखते थे और साधु-संतों इत्यादि के साथ भजन कीर्तन में लगे रहते थे।

उनकी इस प्रकार की रुचि देखकर उनके पिता बड़े परेशान रहते थे और जानवर चराने से लेकर दुकान खोलने तक के दूसरे कार्य उन्हें सौंपते रहते थे। लेकिन उनका मन ना लगना था और ना लगा, बल्कि वह अपनी पूंजी गरीबों और दीन दुखियों में लुटा और देते थे।

इससे संबंधित एक प्रसंग आता है!

दुकान के लिए उनके पिता ने उन्हें ₹20 देकर बाजार से सच्चा सौदा (सामान) लाने के लिए कहा, किंतु जब वह शाम को घर आए तो उनके पिता के पूछने पर उन्होंने बताया कि उन्होंने सच्चा व्यापार किया है और गरीबों को खाना खिलाया है।

यह बिल्कुल सत्य घटना है और आज भी उसी स्थान पर सच्चा सौदा नामक गुरुद्वारे का निर्माण किया गया है।

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बाद में सामाजिक बंधन में बांधने के लिए उनकी शादी भी की गई, लेकिन शादी के बाद भी वह आत्म चिंतन करते रहते थे। इससे संबंधित ज्ञान का प्रकाश फैलाने में गुरु नानक देव जी ने कभी भी कोताही नहीं की। वह हमेशा कहते थे कि ईश्वर हमारे अंदर ही है और अगर हमारे हृदय में प्रेम, करुणा, दया का भाव रहता है तो वह हमें देखते हैं। जबकि हमारे हृदय में क्रोध, निर्दयता, नफरत, निंदा इत्यादि का भाव हो तो ईश्वर हमें नजर नहीं आते।

इस तरीके से वो आडम्बरों का भारी विरोध करते थे। इसका एक और उदाहरण हमें मिलता है, जब उनके पिता ने उनका जनेऊ संस्कार कराना चाहा।

सभी संबंधियों की सभा में जब नानक देव जी ने यह कहा कि उन्हें कपास के सूत पर भरोसा नहीं है, बल्कि सदाचार और अच्छे आचरण, अच्छे व्यवहार से ही मन को पवित्र किया जा सकता है।

शुरू में गुरु नानक देव जी की बातों पर किसी ने भरोसा नहीं किया, लेकिन बाद में उनकी प्रसिद्धि बढ़ती चली गई।

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धीरे-धीरे गुरु नानक देव जी को मर्दाना, रामदास, लहरा, बाला इत्यादि लोगों के रूप में सच्चे शिष्य मिल गए और इनके साथ ही इन्होंने विभिन्न जगहों की यात्राएं शुरू कर दीं। भारत और अफगानिस्तान जैसे दूसरे देशों की इनकी यात्राएं काफी प्रसिद्ध हैं तो भारत में इन्होंने एक कोने से दूसरे कोने तक की यात्रा की।

उनकी ये यात्रायें तकरीबन 8 साल तक चलीं, जिन्हें “उदासियाँ” कहा जाता है। कहते हैं 1507 से 1515 ईस्वी तक नानक देव जी ने अपनी पहली यात्रा यानी उदासी में अपनी शिक्षाओं और सच्चे संदेश का प्रसार किया।


इसी प्रकार 1517 ईस्वी में इन्होंने 1 साल तक अपनी दूसरी यात्रा यानी दूसरी उदासी शुरू की थी और लोगों को मानवता का ज्ञान दिया। तीसरी उदासी की तिथि 1518 से 1521 ई. तक तकरीबन 3 साल की रही।

अपनी तीसरी उदासी में जब मुग़ल सल्तनत के पहले शासक बाबर ने भारत पर आक्रमण करना शुरू किया, तब गुरु नानक देव जी ने अपनी यात्राओं को समाप्त किया और करतारपुर में बस गए। वह अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक यहीं रहे।

जाहिर तौर पर भारतवर्ष के महान धार्मिक नेताओं में गुरु नानक देव जी का नाम आदर के साथ लिया जाता है। उन्होंने ईश्वर के एक होने की, उसके कण-कण में मौजूद होने की और उसी ईश्वर की आराधना करने की पैरवी की। सच्चाई ईमानदारी और कठिन परिश्रम से धन कमाने को उन्होंने खुशी माना, तो भगवान से अपनी गलतियों के लिए क्षमा मांगना उन्होंने सर्वोच्च माना।

इसी तरह से उनकी कई शिक्षाएँ और ज्ञान सिक्खों के सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब’ में उल्लिखित हैं। आज भी संपूर्ण विश्व में गुरु नानक देव की शिक्षाओं पर चलने वाले करोड़ों लोग उन्हें आदर सहित याद करते हैं।

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