अंग्रेजों से लोहा लेने वाले एक से बढ़कर एक स्वतंत्रता सेनानी हुए हैं। इसमें आम से लेकर खास लोग शामिल रहे हैं। टीपू सुल्तान जैसे योद्धाओं ने जब अंग्रेजों से लोहा लिया तो यह भारत की गुलामी के शुरुआती दिन ही थे। तब अँगरेज़ भारत में अपने पांव पसारने की कोशिश ही कर रहे थे।

टीपू सुल्तान ने इतनी कड़ाई से अंग्रेजों का मुकाबला किया था कि अंग्रेजों के दांत पूरी तरह से खट्टे हो गए थे। संभवतः इसीलिए टीपू सुल्तान को ‘मैसूर का टाइगर’ कहा जाता है। जाहिर तौर पर साहस और सूझबूझ के एक बेहतरीन प्रतीक के रूप में टीपू सुल्तान ने अपनी पहचान निर्मित की और इस पहचान को उन्होंने आजीवन कायम भी रखा।

अंग्रेजों के खिलाफ उन्होंने जिस तरह से लड़ाई लड़ी, इसके लिए उन्हें भारत के पहले ‘फ्रीडम फाइटर’ के रूप में भी याद किया जाता है।

20 नवंबर 1750 ईस्वी को जन्मे टीपू सुल्तान का पूरा नाम सुल्तान सईद वाल्शारीफ फतह अली खान बहादुर शाह टीपू था। देवनहल्ली नामक स्थान, जो इस वक्त ‘बेंगलुरू कर्नाटका’ में है, वहां इनका जन्म हुआ था। इनके पिता ‘हैदर अली’ तो मां का नाम ‘फातिमा फख-उन-निसा’ था।

अपने पिता हैदर अली की मौत के बाद टीपू सुल्तान ने मैसूर का राज-काज संभाल लिया था और धीरे-धीरे अपने सल्तनत की सीमाएं बढ़ाने लगे थे।

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टीपू सुल्तान को ‘मैसूरियन राकेट’ का आविष्कार करने के लिए भी जाना जाता है। यहां तक कि टीपू सुल्तान को रॉकेट का पहला अविष्कारक भी माना जाता है। और उसके इस राकेट से अंग्रेज और उसकी सेना थर्राती थी। यह समझना मुश्किल नहीं है कि टीपू सुल्तान एक स्तर पर कितना दूरदर्शी नेता था।

खुद डॉक्टर अब्दुल कलाम ने टीपू सुल्तान के मैसूरियन राकेट का जिक्र अपनी किताब ‘अग्नि की उड़ान’ में किया है।

हालांकि टीपू सुल्तान के पिता हैदर अली बहुत पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन उनकी समझ किसी पढ़े-लिखे से कोसों आगे थी। इसलिए उन्होंने टीपू सुल्तान की शिक्षा और उसके योद्धा बनने पर खासा ध्यान दिया। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि टीपू सुल्तान का राजनीतिक प्रशिक्षण ‘फ्रांसीसी ऑफिसर’ द्वारा किया गया था।

वैसे भी टीपू को ना केवल हिन्दी बल्कि उर्दू, फारसी, अरबी, कन्नड़ और दूसरी भाषाएं बेहतरीन ढंग से आती थीं। मात्र 15 साल की उम्र से ही टीपू सुल्तान कई सैन्य अभियानों में भाग लेने लगे थे। 1766 ईस्वी में ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ हुई पहली मैसूर की लड़ाई में उन्होंने अपने पिता के साथ युद्ध लड़ा था और तब अंग्रेज भाग खड़े हुए थे।

हालाँकि अंग्रेजों के साथ कई निजाम भी मिले होते थे, लेकिन उनके पिता के जमाने से ही उन निजामों को मात देने की प्रथा टीपू सुल्तान ने भी कायम रखी।

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प्रजा का सुख-दुख टीपू सुल्तान के लिए हमेशा सर्वोपरि रहा और इसीलिए प्रजा से उन्हें सम्मान भी मिला। अंग्रेजों के साथ ऐसा नहीं है कि उन्होंने केवल लड़ाई ही लड़ी, बल्कि शांति के लिए उन्होंने मंगलौर की संधि भी कर ली थी। इतना ही नहीं, उन्होंने मराठों और मुगलों के साथ अपने सैन्य-शासन को मजबूत करने के लिए गठबंधन की रणनीति पर भी काम किया।

साथ ही अपने पिता की कई योजनाओं जैसे- सड़क, बांध आदि को भी टीपू सुल्तान ने प्राथमिकता के साथ पूरा किया।

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हालांकि अंग्रेजों की सैन्य शक्ति कहीं ज्यादा मजबूत थी और भारत में भी कई शासकों और निज़ामों ने लार्ड कार्नवालिस जैसे अंग्रेज का साथ दिया। तकरीबन 2 साल तक लड़ाई करने के बाद इस क्रम में टीपू सुल्तान ने ‘श्रीरंगपट्टनम की संधि’ पर साइन कर लिया था और कुछ पल के लिए ही सही अपनी प्रजा में शांति का संचार किया था।

वहीं तीन बड़ी लड़ाईयों में अंग्रेजों को एक तरह से धूल चटाने के बाद चौथी बार ईस्ट इंडिया कंपनी ने टीपू पर जब हमला किया, तब 4 मई 1799 को यह योद्धा वीरगति को प्राप्त हुआ।

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