लाला लाजपत राय, जिन्हें कहा जाता था ‘पंजाब केसरी’

भारत की आजादी में एक से बढ़कर एक नेताओं का योगदान रहा है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि अगर इन नेताओं ने अपनी जान की बाजी लगाकर हमारे देश को आजाद नहीं कराया होता तो आज भी हम किसी अंग्रेज के घर गुलामी कर रहे होते।

अपने ऊपर आए कष्ट की परवाह किए बिना लाला लाजपत राय जैसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने हमारे भविष्य की चिंता की और तभी आज हम खुली हवा में सांस ले पा रहे हैं।

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लाला लाजपत राय ‘लाल-बाल-पाल‘ आजादी के नायकों की तिकड़ी में गिने जाते थे। लाल मतलब लाला लाजपत राय, बाल मतलब बाल गंगाधर तिलक और पाल मतलब बिपिन चंद्र पाल।

इस तिकड़ी से लाला लाजपत राय सच्चे देशभक्त होने के साथ-साथ बेहद हिम्मती क्रांतिकारी थे और एक अच्छे लीडर, अच्छे लेखक, वकील और समाज सुधारक के रूप में उनकी बड़ी ख्याति थी।

ब्रिटिश शासन के खिलाफ भाषण देने में उनका कोई मुकाबला नहीं था और देशभक्ति की भावना ने उन्हें ‘पंजाब केसरी’ / ‘पंजाब के शेर’ की उपाधि से विभूषित कराया था।

28 जनवरी 1865 को जन्मे लाला लाजपत राय के पिता श्री राधा कृष्ण जी और माता श्रीमती गुलाब देवी जी थीं। 1880 में कोलकाता और पंजाब यूनिवर्सिटी से इन्होंने अपनी पढ़ाई की तो 1886 में कानून की डिग्री ली।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, आर्य समाज और हिंदू महासभा से जुड़कर लाला लाजपत राय ने अपनी अद्वितीय नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया। पंजाब केसरी, यंग-इंडिया, भारत का इंग्लैंड पर ऋण, भारत के लिए आत्म निर्णय और तरुण भारत जैसी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने लोगों में अलख जगाने का कार्य किया।

आप यह जानकर हैरान रह जाएंगे कि लाला लाजपत राय द्वारा ही ‘पंजाब नेशनल बैंक’ और ‘लक्ष्मी बीमा कंपनी’ की नींव रखी गई थी। एक आर्य समाजी के रूप में भी लाला लाजपत राय हिंदू समाज में फैली कुरीतियों और धार्मिक अंधविश्वासों के खिलाफ झंडा बुलंद करते रहते थे।

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आर्य समाज के तत्कालीन संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती के साथ मिलकर उन्होंने कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष किया। आप यह जानकर हैरान रह जाएंगे कि इन्हें तत्कालीन समय में आर्य समाज की हिंदू संस्कृति के विरोधी के रूप में जाना जाता था।

हालाँकि लाला लाजपत राय ने आर्य समाज के लिए धन इकट्ठा करने से लेकर समाज में जागरूकता फैलाने तक अधिकतम योगदान दिया।

स्वतंत्रता संग्राम के लिए वह कई बार जेल भी गए तो प्रथम विश्व युद्ध के बाद ‘असहयोग आंदोलन’ में लाला लाजपत राय ने बढ़ चढ़कर भाग लिया और कई आंदोलनों का इन्होंने नेतृत्व किया। 1928 ईस्वी में ब्रिटिश सरकार द्वारा ‘साइमन कमीशन’ लाए जाने के विरोध में लाला लाजपत राय का प्रदर्शन उनके जीवन का आखिरी प्रदर्शन बना।

विभिन्न रैलियों में इन्होंने भाषण दिया, कई आयोजनों में चर्चा की और शांति पूर्वक मार्च भी निकाले। लेकिन साइमन कमीशन के लिए बने पैनल में एक भी भारतीय सदस्य के नहीं शामिल किए जाने के खिलाफ उन्होंने बड़ा आंदोलन किया।

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इसके फलस्वरूप ब्रिटिश गवर्नमेंट द्वारा लाठीचार्ज किया गया और इसी लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय को गहरी चोट लग गई। इस चोट के फलस्वरुप 17 नवंबर 1928 को लाला लाजपत राय सदा-सदा के लिए इस दुनिया को छोड़कर चले गए। हालांकि जाने से पहले उन्होंने आजादी के आंदोलन में अपनी आहुति सुनिश्चित कर दी थी।

उनका एक कथन बड़ा लोकप्रिय हुआ जिसके अनुसार वह कहते थे कि ‘मनुष्य अपने गुणों से आगे बढ़ता है ना कि दूसरों की कृपा से’।

इसी प्रकार कहा करते थे कि ‘मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश साम्राज्य के कफन में एक-एक कील साबित होगी’ ।

और अंततः उनका सपना साकार हुआ जब 15 अगस्त 1947 को अंग्रेज सदा सदा के लिए भारत को स्वतंत्र करके चले गए।

एन.टी. रामाराव: दक्षिण भारत की राजनीति का ‘शक्तिशाली’ नाम

दक्षिण भारत में फिल्म अभिनेताओं का राजनीति में सफल होना नई बात नहीं रही है। खुद एन. टी. रामाराव ना केवल एक अभिनेता, निर्देशक और फिल्म निर्माता थे, बल्कि राजनीति में भी उन्होंने अपनी धाक बखूबी साबित किया है।

आप आंध्र प्रदेश जैसे बड़े स्टेट के तीन बार मुख्यमंत्री रहे हैं और अपनी छाप दक्षिण भारतीय राजनीति पर बखूबी छोड़ी है।

एन. टी. रामाराव का पूरा नाम ‘नंदमूरि तारक रामाराव’ था और इनका जन्म 28 मई 1923 को अंग्रेजी राज्य के मद्रास प्रेसिडेंसी स्थित कृष्ण जिले में एक छोटे गांव निम्माकुरु में हुआ था। रामाराव के माता -पिता ने उनको उनके मामा को गोद दे दिया था और उनका पालन-पोषण उनके मामा ने ही किया था।

इनकी शुरुआती पढ़ाई ज्यादा नहीं हो पायी, लेकिन बाद में वे विजयवाड़ा चले गए। वहां उन्होंने दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की बाद में उन्होंने कालेज की पढ़ाई भी पूरी की।

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एन. टी. रामाराव के फिल्मी कैरियर की बात करें तो ‘मना देसम’ जो 1949 ईस्वी में रिलीज हुई थी, उसमें एंटी रामाराव ने इंस्पेक्टर की भूमिका की थी। इसके बाद एक अंग्रेजी नाटक ‘पिजारो’ पर बेस्ड ‘पल्लेतुरी पिल्ला’ में उनके अभिनय ने जबरदस्त सफलता अर्जित की और रातों-रात एन. टी. रामा राव सुपरस्टार बन गए।

बाद में उन्होंने ‘माया बाजार’ में ‘कृष्ण’ का किरदार निभाया और यह फिल्म बेहद सफल रही थी। इसके बाद तो ये हिंदू पौराणिक चरित्रों के बड़े पापुलर नाम बन गए। रामाराव ने 17 से अधिक फिल्मों में सिर्फ कृष्ण का चरित्र निभाया तो राम, कृष्ण, अर्जुन, भीम, विष्णु, शिव, दुर्योधन इत्यादि के भी किरदार उन्होंने निभाए।

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हालांकि बाद के दिनों में सिस्टम के खिलाफ लड़ने वाले एंग्री यंग मैन का भी किरदार एन टी रामाराव ने निभाया जिनमें ‘देवुदु चेसिना मनुशुलु’, ‘अदावी रामुडु’, ‘ड्राईवर रामुडु’, ‘वेतागादु’, ‘सरदार पापा रायुडु’, ‘जस्टिस चौधरी’ इत्यादि फिल्मों का नाम गिना जा सकता है।

उन्होंने स्क्रिप्ट राइटिंग क्षेत्र में भी हाथ आजमाया तो फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी उन्होंने खासा दखल रखा।

फिल्मों के बाद 1982 ईस्वी में एनटी रामाराव ने ‘तेलुगू देशम पार्टी’ को इस्टैबलिश्ड किया और इसका प्रमुख कारण उन्होंने कांग्रेस से राज्य को मुक्ति दिलाना बताया। अपने पहले ही चुनाव में एन. टी. रामाराव को भारी सफलता मिली और वह राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में गद्दी पर आसीन हुए।

इसके बाद एक के बाद दो और तीन बार वह प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और उनका प्रमुख कार्य पिछड़े वर्गों और महिलाओं को समाज की मुख्यधारा में लाना बताया जाता है।

एन. टी. रामा राव की लोकप्रियता आप इसी बात से समझ लीजिए कि 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे देश में कांग्रेस की लहर थी, लेकिन आंध्र प्रदेश में तेलुगू देशम पार्टी की लहर थी। जाहिर तौर पर यह जनता के दिलों में बसे रहने का ही परिणाम था।

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उन्हें 1968 में ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया, किंतु सभी सम्मानों से बड़ा उनके लिए जो सम्मान था वह दक्षिण की राजनीति में मजबूती से अपनी पार्टी को स्थापित करना था।

राम मनोहर लोहिया: समाजवाद के जनक

बड़े लोग रहे ना रहें, किंतु उनके विचार हमेशा जनमानस के बीच तैरते रहते हैं और ऐसे ही बड़े लोगों में एक नाम राम मनोहर लोहिया का है।

तब आजादी के बाद कांग्रेस देश पर एकछत्र राज कर रही थी और एक सशक्त विपक्ष की कमी देश में थी। तब राम मनोहर लोहिया जैसे लोगों ने विपक्ष की भूमिका को बखूबी निभाया, वह भी उच्च आदर्शों के साथ।

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उनके आदर्शों पर चलकर, उनका नाम लेकर कालांतर में कई राजनेता हुए, जिन्होंने भारतीय राजनीति को गहरे तक प्रभावित किया।

23 मार्च 1910 को अकबरपुर – फैजाबाद में पैदा हुए राम मनोहर लोहिया की पहचान प्रखर समाजवादी की रही है। एक स्वतंत्रता सेनानी और एक राजनेता के तौर पर भी उनकी ख्याति कुछ कम नहीं है।

उनके आदर्शों का आलम यह था कि न केवल उनके समर्थक बल्कि उनके विरोधी भी उन्हें बेहद आदर के साथ देखते थे। राम मनोहर लोहिया के पिता भी स्वतंत्रता सेनानी थे और अपने बचपन में राम मनोहर उन लोगों के साथ विभिन्न रैलियों और सभाओं में जाते रहते थे।

एक बार राम मनोहर लोहिया के पिता महात्मा गांधी से मिलने अपने बेटे को साथ लेकर गए। राम मनोहर लोहिया जब महात्मा गांधी से मिले, तब उनके विचारों में काफी दृढ़ता आई और उनकी सोच और भी प्रखर हुई।

बाद में राम मनोहर लोहिया जवाहरलाल नेहरू के भी संपर्क में आये, लेकिन उन दोनों के बीच कई मुद्दों पर असहमति थी जो बाद के दिनों तक बरकरार रही।

इतना ही नहीं मात्र 28 साल की उम्र में यानी 1928 में साइमन कमीशन का विरोध करने युवा राम मनोहर मैदान में उतर पड़े थे।

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राम मनोहर की शिक्षा दीक्षा की बात करें तो उन्होंने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की तो 1929 ईस्वी में कोलकाता यूनिवर्सिटी से अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की। बाद में वह पीएचडी करने जर्मनी गए, जहां उन्होंने बर्लिन विश्वविद्यालय से 1932 में इसे पूरा किया। जर्मन भाषा भी राम मनोहर लोहिया को बहुत अच्छे ढंग से आती थी।

हालांकि विश्व की दूसरी भाषाओं को जानने वाले राम मनोहर लोहिया हमेशा ही हिंदी को प्राथमिकता देते रहे। यहां तक कि अंग्रेजी की बजाय वह हिंदी पर ही अधिक जोर देते थे। उनका मानना था कि अंग्रेजी, भारतीय जनमानस को देश से दूर करती है, विभेद पैदा करती है।

राम मनोहर लोहिया के जो सबसे बड़ा विचार था, वह जात-पात का विरोध था। वह पहले ऐसे राजनेता थे जो तत्कालीन समय में रोटी और बेटी के सिद्धांत को प्रतिपादित करते थे।

उनका मानना था कि जब तक ऊंची जाति और नीची जाति में खानपान का और रिश्तो का सम्बन्ध नहीं होगा, तब तक जाति-व्यवस्था का समाप्त होना दिवास्वप्न ही है। अपने समाजवादी विचार के लिए उन्होंने यूनाइटेड सोशलिस्ट पार्टी में कई छोटी जाति के उम्मीदवारों को टिकट दिया और उन्हें आगे प्रमोट किया।

आजादी की लड़ाई के दौरान 24 मई 1939 को भड़काऊ बयानबाजी के लिए अंग्रेजी सरकार द्वारा इन्हें गिरफ्तार किया गया, लेकिन इनको युवाओं का इतना समर्थन था कि अंग्रेज सरकार ने जल्द ही राम मनोहर को छोड़ दिया।

हालांकि 1940 ईस्वी में वह फिर गिरफ्तार किए गए और 1 साल जेल में रहने के बाद 1941 में रिहा किए गए। 1942 ईस्वी में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्हें देश के प्रमुख नेताओं के साथ एक बार फिर कैद किया गया, लेकिन उनके विचारों को दबा पाना किसी के लिए मुमकिन न था।

आजादी के बाद की गतिविधियों को बात करें, तो जल के संरक्षण के लिए उन्होंने नहरों इत्यादि के पुनर्निर्माण में जनता की भागीदारी पर जोर दिया। सड़कों के निर्माण में भी उन्होंने जनता की भागीदारी और निजी भागीदारी सुनिश्चित करने का प्रयत्न किया।

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राम मनोहर लोहिया को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के ऊपर 1 दिन में ₹25000 खर्च किए जाने के खिलाफ आवाज उठाने के लिए भी जाना जाता है।

तत्कालीन समय में एक व्यक्ति की आमदनी मात्र 3 आना थी, जबकि योजना आयोग 15 आना की आमदनी बतलाता था। जाहिर तौर पर इसके खिलाफ लोहिया ने आवाज उठाई। इसके अतिरिक्त अमीर-गरीब की खाई, स्त्री पुरुष के बीच की खाई और एग्रीकल्चर से संबंधित तमाम समस्याओं के लिए राम मनोहर ने लड़ाई लड़ी।

बाद में 12 अक्टूबर 1967 ईस्वी को मात्र 57 साल की उम्र में राम मनोहर लोहिया का निधन हो गया। उनके प्रमुख शिष्यों में समाजवाद के कई लोग जाने जाते हैं, जिनमें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे मुलायम सिंह यादव प्रमुख हैं। वर्तमान समय में नीतीश कुमार और दूसरे कई समाजवादी राम मनोहर लोहिया के शिष्य होने का दावा करते हैं।

डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी: जिसने की धारा 370 खत्म करने की सबसे पहले मांग

पिछले दिनों कश्मीर में जब भारत सरकार ने धारा 370 के समाप्त होने की घोषणा की तब बड़ा हो हल्ला मचा था। भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान ने हर जगह हाय तौबा मचाई और इस धारा के खत्म होने पर अपना विरोध जाहिर किया।

पर क्या आपको पता है कि धारा 370 खत्म करने की मांग करने वाले पहले व्यक्ति कौन थे?

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ना केवल मांग करने वाले, बल्कि कश्मीर को भारत में पूर्ण रूप से विलय करने के लिए उन्होंने ‘एक विधान, एक निशान, एक प्रधान‘ का नारा दिया था।

आपको बता दें कि वो महान शख्सियत थे ‘डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी’!

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक शिक्षाविद के रूप में भी अपनी पहचान रखते थे, तो भारतीय जनता पार्टी से पहले के संगठन ‘भारतीय जनसंघ’ के संस्थापक थे। जाहिर तौर पर प्रखर राष्ट्रवाद उनका चरित्र था।

6 जुलाई 1920 को कोलकाता के एक परिवार में जन्मे डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के पिता का नाम ‘सर आशुतोष मुखर्जी’ था और उनकी माता का नाम ‘जोगमाया देवी’ था। 1917 ईस्वी में मैट्रिक और 1921 ईस्वी में बीए की परीक्षा पास करके 1924 ईस्वी में उन्होंने कानून की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद जल्द ही उनकी ख्याति एक शिक्षाविद के रूप में फैल चुकी थी।

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1927 में वो इग्लैंड से बैरिस्टर बनकर लौटे और सन 1934 में वो कोलकाता यूनिवर्सिटी के कुलपति पद पर आसीन हुए। उन्हीं के कार्यकाल में रविंद्र नाथ टैगोर द्वारा बांग्ला भाषा में कोलकाता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह को संबोधित किया गया था, जो तब बड़ा चर्चित हुआ था।

उनके पॉलिटिकल कैरियर की बात करें तो 1929 ईस्वी में कांग्रेस पार्टी के टिकट पर उन्होंने बंगाल विधान परिषद में प्रवेश किया, किंतु जल्द ही उन्होंने इसे इस्तीफा भी दे दिया। बाद में वह निर्दलीय चुनाव लड़े और जीते भी। 1941-42 में वह बंगाल राज्य के फाइनेंस मिनिस्टर रहे तो 1937 से 1941 के बीच कृषक प्रजा पार्टी और मुस्लिम लीग की साझा सरकार के खिलाफ वह विपक्ष के नेता थे।

इसके बाद वह धीरे-धीरे हिंदू हितों के प्रति जागरूक हुए और बाद में वह हिंदू महासभा में शामिल हुए। 1944 ईस्वी में वह हिंदू महासभा के अध्यक्ष चुने गए थे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने सबसे पहले मोहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम परस्त राजनीति का विरोध किया और धर्म के आधार पर देश के विभाजन का कट्टर विरोध किया।

उनका मानना था कि भारत के हिंदू, मुसलमान और दूसरे सभी लोग एक ही भाषा और संस्कृति के हैं, इसलिए विभाजन नहीं होना चाहिए।

हालांकि 1946 और 47 में जब भयंकर दंगे हुए तब उन्होंने बंगाल विभाजन का समर्थन किया।

आजादी के बाद कांग्रेस की जवाहरलाल नेहरू सरकार में डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी उद्योग और आपूर्ति मंत्रालय के मंत्री बने लेकिन कांग्रेस से उनका मतभेद बना रहा। अंततः 6 अप्रैल 1950 को उन्होंने कांग्रेस मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद अक्टूबर 1951 में उन्होंने भारतीय जनसंघ की नींव रखी। 1952 के चुनाव में इस पार्टी ने 3 सीटें जीती थीं, जिनमें एक खुद उन्हीं की सीट थी।

तत्कालीन समय में कश्मीर राज्य में मुख्यमंत्री का कोई पद नहीं था और वहां का मुख्यमंत्री खुद को वजीरे आजम यानी प्रधानमंत्री कहता था। तब कश्मीर में जाने के लिए किसी भी भारतीय को बकायदा परमिट लेना पड़ता था।

इसके विरोध में 1952 ईस्वी में उन्होंने कश्मीर में प्रवेश का निश्चय किया और 1953 ईस्वी में वह बिना परमिट के ही कश्मीर की ओर निकल पड़े। वहां उन्हें गिरफ्तार किया गया जहां संदिग्ध परिस्थिति में 23 जून 1953 को उनकी मौत हो गई।

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मौत के कई साल बाद उनके द्वारा लगाया गया राजनीतिक वृक्ष भारतीय जनसंघ यानि कि भारतीय जनता पार्टी के रूप में परिवर्तित हुआ।

इसी भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने 2019 में कश्मीर से धारा 370 हटा कर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के उस सपने को साकार किया जिसके लिए उन्होंने अपनी जान दी थी।

जयप्रकाश नारायण: आपातकाल के ‘लोकनायक’

स्वतंत्र भारत में यह सबसे बड़ा लोकतांत्रिक संकट था, जब भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगा दिया। इस आपातकाल के दौरान तमाम विपक्षी नेताओं का समूह जेल में ठूंस दिया गया और हर तरह के प्रतिबंध नागरिक अधिकारों पर थोप दिए गए।

ऐसी स्थिति में निरंकुश सत्ता के खिलाफ खड़ा होने वाला नाम कोई और नहीं बल्कि ‘जयप्रकाश नारायण’ का नाम था।

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जयप्रकाश नारायण का जन्म 11 अक्टूबर 1902 को ‘सिताबदियारा’ बलिया उत्तर प्रदेश में हुआ था। हालांकि कई लोग इनके जन्म स्थान को बिहार में भी मानते हैं। इनके पिता का नाम ‘हर्सुल दयाल श्रीवास्तव’ तो माता का नाम ‘फूल रानी देवी’ था। 9 साल की उम्र में ही यह पटना में चले गए थे, जहां उन्होंने साहित्य का खासा अध्ययन किया। 1920 ईस्वी में इनका विवाह प्रभावती देवी से हुआ।

पढ़ाई करते हुए 1922 में जयप्रकाश अमेरिका भी गए। उन्होंने ‘बर्कले यूनिवर्सिटी’ में पढ़ाई की। अपना खर्चा उठाने के लिए कंपनियों, रेस्टोरेंट्स और खेतों तक में काम किया। यहीं से वह ‘मार्क्स के समाजवाद’ के प्रति आकर्षित हुए थे। बाद में मां की तबीयत खराब होने के कारण वो भारत लौट गए।

1929 ईस्वी में जब जयप्रकाश नारायण भारत लौटे, तब स्वाधीनता संग्राम बड़ी तेजी से आगे बढ़ रहा था और इसी दरमियान जयप्रकाश महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के साथ जुड़ गए। बड़े नेता जब जेल जाते थे तब जयप्रकाश नारायण आंदोलनों की कमान संभालते थे। हालांकि इन्हें भी 1932 में गिरफ्तार करके नासिक जेल भेजा गया था।

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जेल में उनकी मुलाकात कई दूसरे क्रांतिकारी नेताओं से हुई और नींव पड़ी ‘कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी’ यानी ‘सीएसपी’ की। इस पार्टी ने 1934 में अंग्रेजी राज्य में हुए चुनाव में हिस्सा नहीं लिया, बल्कि इसका विरोध किया।

‘सेकंड वर्ल्ड वार’ में उन्होंने अंग्रेजो के खिलाफ मूवमेंट को लीडरशिप प्रदान किया और इससे सरकार को मिलने वाले राजस्व में भारी संख्या में कमी आई।

इस समय भी उन्हें गिरफ्तार करके 9 महीने की सजा सुनाई गई थी। स्वाधीनता संग्राम में यह भी कहा जाता है कि जयप्रकाश नारायण ने महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस के बीच मतभेदों को दूर करने का भी प्रयास किया।

देश आजाद हुआ, लेकिन प्रशासन में हीला-हवाली के चलते बहुत सारे घोटाले हुए। भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के कारण जनता परेशान थी और ऐसे में जयप्रकाश नारायण ने उन्हें नेतृत्व दिया। इसी क्रांति को ‘संपूर्ण क्रांति’ के नाम से जाना गया।

हालांकि जब 1975 में आपातकाल लागू हुआ तब ‘जेपी’ को दूसरे नेताओं के साथ जेल में डाल दिया गया था और यहीं से संपूर्ण क्रांति आंदोलन ने जोर पकड़ा। ठीक इसी के बाद पहली बार भारत में गैर कांग्रेसी सरकार बनी।

जयप्रकाश नारायण की गिरफ्तारी के बाद जेल में उनकी तबीयत खराब होने लगी और इसी से परेशान होकर जेल प्रशासन ने 12 नवंबर 1976 को उन्हें छोड़ दिया। बाद में पता चला कि उनकी किडनी खराब हो गई थी और इसके बाद 1979 में 8 अक्टूबर तक वह डायलिसिस पर ही रहे।

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8 अक्टूबर 1979 को ही जयप्रकाश नारायण का निधन हो गया, लेकिन आजाद भारत में उनके योगदान को भुलाना किसी के लिए भी संभव नहीं है।

उन्हें मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया तो 1965 में उन्हें ‘मैग्सेसे पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था।

इससे इतर जनता के हृदय में जो सम्मान जयप्रकाश नारायण ने अर्जित किया वह किसी भी दूसरे सम्मान से कहीं आगे का था और इस बात में किसी को भी कोई संदेह नहीं होना चाहिए।

KFC का ब्रांड वर्ल्ड वाइड खड़ा करने वाले ‘सैंडर्स’

अक्सर लोग यह समझते हैं कि सफलता प्राप्त करने की एक खास उम्र होती है, लेकिन KFC के सैंडर्स ने इस धारणा को तोड़ कर रख दिया। लोग अक्सर यह बात नहीं जानते हैं कि किसी के सफलता प्राप्त करने की आखिरी हद क्या हो सकती है?

कोई एक बार असफल हो सकता है, कोई दो बार कोई 10 बार, तो कोई सौ बार, लेकिन इतिहास में ऐसे बहुत कम उदाहरण मिलते हैं, जिसमें हजार से अधिक बार असफल होने के बाद भी किसी ने अपनी कोशिश जारी रखी और अंततः उसकी सफलता ने सारे संसार में शोर मचा दिया।

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यह कहानी है ‘कर्नल हारलैंड सैंडर्स’ की जो दुनिया भर की बड़ी और फेमस फ्राइड चिकन फ्रेंचाइजी केएफसी के फाउंडर हैं। आइए नज़र डालते हैं उनकी सफलताओं और संघर्ष पर।

9 सितंबर 1890 को इंडियाना के हैनरीविले शहर में सैंडर्स का जन्म हुआ था और बेहद कम उम्र, जब वह मात्र 6 साल के थे, तब उनके पिता स्वर्ग सिधार गए। उनकी मां ने टमाटर की फैक्ट्री में काम करके जैसे-तैसे उनको पाला और इस प्रक्रिया में वह मात्र सातवीं तक की पढ़ाई कर घर चलाने लगे।

खेतों में भी असिस्टेंट के तौर पर उन्होंने कार्य किया और धीरे-धीरे वह 16 साल की उम्र तक पहुंच गए। पैसे की जरूरत सैंडर्स को इतनी थी कि अपनी उम्र छिपाकर वह अमेरिकी सेना में भर्ती हो गए, लेकिन मात्र 1 साल बाद उनका यह झूठ पकड़ लिया गया और वह सेना से बाहर कर दिए गए।

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इसके बाद उन्होंने रेलवे में मजदूरी भी की। हालांकि यहां भी वो नहीं टिक पाए, क्योंकि पुलिस के साथ झगड़ा के चलते उन्हें निकाल दिया गया। बाद में उन्होंने इंश्योरेंस एजेंट के तौर पर कार्य स्टार्ट किया, लेकिन यहां भी उनके स्वभाव के कारण नौकरी से निकाल दिया गया।

इन सारी असफलताओं में एक बात कॉमन थी कि उन्होंने कभी हार नहीं मानी और एक के बाद एक असफलताओं के बाद भी उन्होंने 1920 में नाव बनाने की एक छोटी कंपनी खोल दी।

बाद में उन्होंने नाव की जगह लैंप बनाने का कार्य शुरू किया। ठीक तभी कोई दूसरी कंपनी अच्छे लैम्प लेकर मार्किट में आ गयी और इस वजह से सैंडर्स का यह काम भी नहीं चल पाया।

40 की उम्र तक सैंडर्स अब तक पहुंच गए थे और तब उन्होंने चिकन बेचने का काम शुरू करने का फैसला किया।

आप जानकर हैरान रह जाएंगे कि सड़क से गुजरने वाले तमाम लोगों को उन्होंने फ्री में चिकन डिस्ट्रीब्यूट किया। इसके बाद एक छोटा सा रेस्टोरेंट खोला और संयोगवश 1935 में उस स्थान के गवर्नर ‘रूबी लैफ्फून’ ने सैंडर्स के रेस्टोरेंट में नाश्ता किया और बेहतरीन स्वाद के कारण रेस्तरां को ‘केंतकी कर्नल’ का नाम दिया।

इसके बाद उनका रेस्टोरेंट धीरे-धीरे मशहूर होने लगा।

यह दूसरा विश्व युद्ध शुरू होने का समय था और इसी समय सैंडर्स ने दूसरा रेस्टोरेंट खोला, पर यह बंद हो गया। बाद में सैंडर्स ने फ्रेंचाइजी मॉडल पर अपने बिजनेस को बढ़ाने का निश्चय किया और तमाम रेस्टोरेंट्स से पार्टनरशिप करने की दिशा में आगे बढे।

इस प्रक्रिया में उन्हें 1009 बार असफलता का सामना करना पड़ा, लेकिन धीरे धीरे सफलता उनके पास आती चली गई। आपको बता दें कि 1964 तक KFC की 600 ब्रांच खुल गई थीं। इसके बाद कर्नल सैंडर्स ने अपनी कंपनी को इन्वेस्टर्स को बेच दिया।

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1969 में न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में यह कंपनी लिस्ट हुई और बाद में इसकी शाखाओं की संख्या 3500 तक पहुंच गई। 1971 में ‘हेयुबलेन इंडस्ट्री’ ने इस कंपनी को 285 मिलियन में खरीदा। इसके बाद इस कंपनी को ‘रेयनोल्ड्स’ इंडस्ट्री ने खरीद लिया।

इसके बाद केएफसी उन्हीं की इंडस्ट्रीज का भाग बन गई। 1986 में पेप्सिको कंपनी ने 840 मिलीयन डॉलर चुका कर KFC को खरीद लिया, बावजूद इसके आज भी KFC की पहचान सैंडर्स का चेहरा ही है।

तो अब आप क्या कहेंगे सफलता में उम्र बाधा बनती है या फिर असफलता बाधा बनती है?

मायावती: दलितों की महान नेत्री

पिछले कई दशकों से भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की राजनीति के केंद्र में मायावती रही हैं। उनके समकालीन राजनीति करने वाले लोग अब रिटायर हो रहे हैं, किंतु वह मजबूती से जमी हुई हैं।

2014 के आम चुनाव में जब उनकी पार्टी ‘बहुजन समाज पार्टी’ को एक भी सीट नहीं मिली, तब उन्हें खत्म हुआ मान लिया गया, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने 10 लोकसभा सीट पर अपना परचम लहराकर साबित कर दिया है कि वह अभी समाप्त नहीं हुई हैं।

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परंतु मायावती का योगदान इससे कहीं आगे है।

15 जनवरी 1956 को दिल्ली में जन्मी मायावती का शुरुआती नाम चंद्रावती देवी था। उनकी मां रामरति व पिता प्रभु दयाल थे। उन्होंने दिल्ली के कालिंदी कॉलेज से ग्रेजुएशन किया और दिल्ली यूनिवर्सिटी से ही एलएलबी और बीएड भी किया। प्रशासनिक सेवा की तैयारी में मायावती ने अपना काफी वक्त लगाया और बाद में उन्होंने टीचर के रूप में जीवन-यापन करने की शुरुआत की थी।

इसी दरमियान दलित नेता कांशी राम के संपर्क में मायावती आयीं। हालांकि उनके परिवार वाले कांशी राम से उनको दूर करने का जतन करते रहे, लेकिन मायावती ने किसी की नहीं सुनी और कांशी राम के साथ अपना राजनीतिक, सामाजिक जीवन शुरू कर दिया।

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1984 में ही कांशीराम ने ‘बहुजन समाज पार्टी’ का गठन किया और इसी समय मायावती टीचर की नौकरी छोड़कर इस संगठन से पूरी तरह जुड़ गयीं। कई चुनाव में मुंह की खाने के बाद भी मायावती और कांशीराम लगे रहे और धीरे-धीरे पिछड़े और दलितों में इस पार्टी ने गहरी पैठ बना ली।

इसी का परिणाम था कि 1995 ईस्वी में वह सपा के सहयोग से उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। 2001 में कांशी राम ने मायावती को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया और मायावती का संघर्ष चलता रहा। 2002 और 2003 के दौरान मायावती एक बार फिर से भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से मुख्यमंत्री बनीं। हालांकि यह सरकार कुछ दिन बाद ही गिर गई।

मायावती फिर एक बार 2007 में पूर्ण बहुमत से सत्ता में लौटीं और अपने सख्त प्रशासन से अधिकारियों को उन्होंने जनता की सेवा करने का कड़ा निर्देश जारी किया।

हालांकि अपने कार्यकाल में उन्होंने मूर्तियों और स्मारकों पर जिस प्रकार पैसा खर्च किया उसकी बड़ी आलोचना हुई और सुप्रीम कोर्ट में केस तक दायर हुआ।

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हालांकि एक बात यह भी सच है कि मायावती ने यहां तक पहुंचने के लिए बड़े संघर्षों का सामना किया है। एक बार तो उन पर जानलेवा हमला भी किया गया, जिसे ‘गेस्ट हाउस कांड’ के रूप में जाना जाता है।

हालांकि इन सब से उबर कर मायावती ने जिस प्रकार राजनीति में अपना स्थान बनाया और दलितों पिछड़ों की आवाज बनीं, वह अपने आप में एक मिसाल है।

लालू प्रसाद यादव: गरीबों का मसीहा या घोटालेबाज, या मसखरा?

लालू प्रसाद की सार्वजनिक जीवन में यही दो- तीन छवियां रही हैं। उन्हें या तो चाहने वाले लोग हैं या नफरत करने वाले या उनका मजाक उड़ाने वाले, पर राजनीति में उनकी तूती दशकों तक बोलती रही है।

उनके बारे में कहा जाता रहा है कि जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब तक रहेगा बिहार में लालू

इस बात में दो राय नहीं है कि बिहार की राजनीति में उनका वर्चस्व जाति के आधार पर रहा है और इसी आधार ने उन्हें एक लंबे समय तक शासन में बनाए रखा है। हालाँकि बाद के दिनों में यह आधार जरूर कुछ सरका, लेकिन अभी भी अपने वोटर्स पर उनकी पकड़ का कोई जवाब नहीं है।

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11 जून 1948 को बिहार के गोपालगंज में लालू प्रसाद यादव का जन्म हुआ था। इनके पिता ‘कुंदन राय’ और माता ‘मराछिया’ देवी थीं। गोपालगंज से इनकी शिक्षा-दीक्षा हुई और बाद में यह पटना चले गए। पटना में इन्होंने लॉ में ग्रेजुएशन की और छात्र राजनीति में सक्रिय हो गए। 1970 ईस्वी में वह पटना यूनिवर्सिटी के छात्र संघ के महासचिव चुने गए थे।

यहीं से उन्होंने मेनस्ट्रीम की राजनीति शुरू की। इस वक्त तक वो जयप्रकाश नारायण, कर्पूरी ठाकुर, सत्येंद्र नारायण सिन्हा, राज नरेन जैसे नेताओं से काफी प्रभावित रहे। सत्येंद्र नारायण सिन्हा की मदद से लालू प्रसाद यादव ने तभी लोकसभा चुनाव लड़ा और जीत कर भारतीय संसद में युवा सदस्य के रूप में विख्यात हो गए।

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मात्र 10 वर्षों के अंतराल पर लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री चुने गए। इसके बाद वो एक बेहद ताकतवर शख्सियत के रूप में उभरे लेकिन चारा घोटाले में नाम आने के बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। बाद में उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को बिहार का मुख्यमंत्री बना कर समूचे देश में सुर्खियां बटोरी।

लालू यादव ने छपरा और मधेपुरा से लोकसभा का चुनाव जीतकर 2004 में केंद्रीय रेल मंत्री का पदभार संभाला। तत्कालीन यूपीए सरकार में उन्होंने जिस प्रकार घाटे में चल रही रेलवे को फायदे में बदला, उसने दुनिया के तमाम प्रबंध संस्थानों को एक नया सब्जेक्ट दे दिया।

हालाँकि 2009 के बाद लालू की ताकत घटती गई और और बाद में उन्होंने नीतीश कुमार से मिलकर एक बार पुनः बिहार में सरकार जरूर बनाई, लेकिन उन दोनों का गठबंधन जल्द ही टूट गया। इसके बाद से बिहार में लालू यादव राजनीतिक उभार की तरफ बढ़ नहीं सके।

माना जाता है कि अपने शासनकाल के दौरान ऊंची जातियों के वर्चस्व को तोड़कर लालू प्रसाद यादव ने निचली जातियों का सामाजिक समीकरण मजबूती से गढ़ा। इसी समीकरण के दम पर वह बिहार की राजनीति में शीर्ष पर भी बने रहे।

कई लोग गरीबों के उभार के लिए उन्हें गरीबों का मसीहा भी करते हैं, लेकिन यह भी सच है कि लालू प्रसाद यादव के कार्यकाल के दौरान बिहार में अपहरण उद्योग एक संगठित उद्योग के रूप में समूचे देश में कुख्यात हो चुका था।

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एक से बढ़कर एक अपराधी बिहार में आगे बढ़ने लगे और इसके लिए बिहार को जंगलराज की संज्ञा दी गई। बिहार को बदनाम करने के लिए कई बिहारी लोग लालू प्रसाद यादव से नफरत भी करते हैं।

इन दोनों से इतर लालू प्रसाद यादव की सार्वजनिक छवि हंसाने वाले राजनेता की भी रही है। उनके भाषणों को अगर आप सुनेंगे तो वह बेहद चुटीले होते हैं और बड़ी सहजता से वह गंभीर से गंभीर बात कह जाते हैं।

हालांकि लालू प्रसाद के अस्तित्व को नकारना किसी के लिए भी मुमकिन नहीं हो सका है और शायद यही उनकी खासियत भी है।

किसानों के बड़े नेता ‘चौधरी चरण सिंह’

आजादी के बाद ऐसे कई सारे नेता हुए, जिन्होंने भारत-निर्माण में अपना योगदान दिया। चूंकि भारत की अर्थव्यवस्था शुरू से ही कृषि प्रधान रही है, इसलिए राजनीतिक परिदृश्य में किसान यहां हमेशा ही केंद्र में रहे हैं।

दुर्भाग्य यह है कि किसानों के केंद्र में होने के बावजूद बहुत कम ऐसे राजनेता हुए हैं, जिन्होंने वाकई उनकी समस्याओं पर ध्यान दिया है। इन राजनेताओं में चौधरी चरण सिंह का नाम सबसे आदर के साथ लिया जाता है।

भारत के पांचवें प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने शपथ ली थी और बेहद कम समय तक प्रधानमंत्री पद पर रहने के बावजूद उन्होंने अपनी छाप छोड़ी थी। प्रधानमंत्री के अलावा वह भारत के उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के रूप में भी आसीन रहे।

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23 दिसंबर 1902 को उत्तर प्रदेश के नूरपुर गांव में इनका जन्म हुआ था। बताया जाता है कि इनका संबंध बल्लभगढ़ के राजा से था। गौरतलब है कि 1857 की क्रांति में राजा नाहर सिंह का खासा योगदान था और उन्हें पकड़ने के बाद दिल्ली की चांदनी चौक में सरेआम फांसी पर लटकाया गया था। अंग्रेजों का कहर नाहर सिंह के पूरे परिवार पर टूटा था और इसलिए चौधरी चरण सिंह का परिवार उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में चला गया था।

मेरठ से ही चौधरी चरण सिंह की शिक्षा दीक्षा हुई थी। बाद में आगरा यूनिवर्सिटी से उन्होंने लॉ की पढ़ाई की और तत्पश्चात गाजियाबाद में 1928 से वकालत शुरु कर दिया था। वकालत में उन्होंने अच्छा खासा नाम कमाया, क्योंकि वह बेहद ईमानदारी के साथ पेश आते थे। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि वकील के तौर पर वह सिर्फ सच्चाई के पक्ष वाले मुकदमों को ही स्वीकार करते थे।

आजादी के पहले से ही वह राजनीतिक रूप से सक्रिय थे और 1929 ईस्वी में जब कांग्रेस कमेटी का गाजियाबाद में गठन हुआ, तब 1930 ईस्वी में सविनय अवज्ञा आंदोलन करते हुए उन्होंने नमक कानून तोड़ा। इसके फलस्वरूप उन्हें 6 महीने की सजा दी गई थी। इस आंदोलन के बाद उन्होंने खुद को पूर्ण रूप से देश सेवा के लिए समर्पित कर दिया।

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1937 ईस्वी में जब वह 34 साल के थे तब बागपत विधानसभा से चुने गए और किसानों के अधिकारों के लिए उन्होंने तत्कालीन विधानसभा में एक बिल पेश किया था। बाद में उनके इस पैटर्न को कई अन्य राज्यों ने भी अपनाया।

1940 ईस्वी में गांधी जी द्वारा सत्याग्रह करने के दौरान भी चरण सिंह को गिरफ्तार किया गया और वो 1 साल बाद रिहा किए गए थे।

बाद में 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में जब ‘करो या मरो’ का नारा दिया गया था, तब पश्चिमी यूपी में भूमिगत रहकर चौधरी चरण सिंह ने संगठन तैयार किया, जिसमें एक से बढ़कर एक क्रांतिकारी शामिल थे। हालांकि बाद में उन्हें गिरफ्तार करके डेढ़ साल की सजा सुनाई गई थी।

आजादी के बाद चौधरी चरण सिंह 1952, 1962 और 1967 में विधानसभा चुनाव के लिए चुने गए और पार्लियामेंट सेक्रेटरी भी रहे। कई विभागों में इन्होंने अपनी जिम्मेदारियों को निभाया और उत्तर प्रदेश सरकार में उन्हें कैबिनेट मंत्री का पद भी मिला था।

1960 ईस्वी में चंद्र भानु गुप्ता जब यूपी के चीफ मिनिस्टर बने, तब उन्हें कृषि मंत्रालय मिला। 1967 ईस्वी में कांग्रेस से विवाद होने के बाद इन्होंने पार्टी छोड़कर ‘भारतीय क्रांति दल’ की स्थापना की।

फिर फायरब्रांड लीडर राजनारायण और राम मनोहर लोहिया जैसे नेताओं के सहयोग से उत्तर प्रदेश में 1967 और 1970 में मुख्यमंत्री बने।

1975 में देश में आपातकाल लगा और चरण सिंह राजनीतिक बंदी के तौर पर जेल में रहे। 1977 ईस्वी में जनता पार्टी चुनाव में विजयी रही और चरण सिंह इसमें मुख्य भूमिका में आते हुए गृह मंत्री और उप-प्रधानमंत्री का दायित्व संभाले रहे।

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हालांकि बाद में जनता पार्टी में आपसी कलह हो गई और कांग्रेस के समर्थन से चौधरी चरण सिंह ने 28 जुलाई 1979 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। हालांकि इंदिरा गांधी ने जल्द ही चौधरी चरण सिंह से समर्थन वापस ले लिया और बिना संसद का सामना किए ही चरण सिंह की सरकार गिर गई।

जाहिर तौर पर आजादी के पहले और आजादी के बाद चौधरी चरण सिंह का संघर्ष बेमिसाल रहा ही है, लेकिन जिस प्रकार से उन्होंने किसानों के लिए संघर्ष किया वह कभी भुलाया नहीं जा सकेगा।

जॉर्ज फर्नांडिस: संघर्षों की राह से निकला ‘नायक’

जॉर्ज फर्नांडिस को अधिकतर लोग भारत के रक्षा मंत्री के रूप में ही जानते हैं, जो तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के प्रिय कैबिनेट मंत्री भी थे। पर रक्षा मंत्री के अलावा जॉर्ज फर्नांडिस की शख्सियत कहीं ज्यादा विराट थी। वह शख्सियत कोई पैराशूट से उतारी गई शख्सियत नहीं थी, बल्कि जमीन पर किए गए संघर्ष की बदौलत बनी थी।

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3 जून 1930 को कर्नाटक के बैंगलोर में जन्मे जॉर्ज फर्नांडिस ट्रेड यूनियन लीडर के रूप में एक लंबे समय तक सक्रिय रहे थे। ताउम्र उन्होंने मजदूरों के लिए संघर्ष किया और इसी के बल पर उनकी शख्सियत का निर्माण भी हुआ। इनके पिता का नाम जॉन जोसेफ फर्नांडीस और मां का नाम एलीस मार्था फर्नांडिस था।

जॉर्ज के नाम के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है। इनकी माता किंग जॉर्ज पंचम की बहुत बड़ी फैन थीं और उनका जन्म भी 3 जून को ही हुआ था, इसीलिए अपने बेटे का नाम उन्होंने जॉर्ज फर्नांडिस रखा।

इन्होंने 16 वर्ष की आयु में रोमन कैथोलिक पादरी का भी प्रशिक्षण लिया था। हालांकि बाद में उन्होंने अपने रिलीजियस स्कूल को छोड़ दिया था। इसकी वजह थी कि वहां के पादरी समानता में विश्वास नहीं रखते थे और खुद ऊंचे टेबल पर बैठ कर भोजन करते थे, जबकि बाकी लोगों को नीचे बिठाते थे।

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इसके बाद से जॉर्ज फर्नांडिस का संघर्ष शुरू हुआ और उन्होंने रेस्टोरेंट, होटल, सड़क इत्यादि में काम करने वाले मजदूरों को एकत्रित किया।

1949 ईस्वी में जॉर्ज फर्नांडिस मुंबई आ गए थे, जहां एक अखबार में प्रूफरीडर के तौर पर कार्य करने लगे थे। यहीं इनकी मुलाकात बड़े यूनियन नेता प्लासिड डी मेलो और राम मनोहर लोहिया से हुई। इस तरीके से जॉर्ज फर्नांडीस समाजवादी व्यापार संघ के आंदोलन से जुड़ गए थे। वहीं इसके प्रमुख नेता के रूप में उभरने के बाद 1961 से 1968 तक मुंबई म्युनिसिपालिटी के मेंबर भी रहे और कामगारों की आवाज को उन्होंने तब बखूबी उठाया।

इतना ही नहीं, 1967 ईस्वी के आम चुनाव में वो पहली बार उतरे और उस वक्त के कांग्रेस के बड़े नेता माने जाने वाले सदाशिव कानोजी को हराकर वह लोकसभा में पहुंच गए।

एक तरफ राजनीतिक सफर चलता रहा और 1974 ईस्वी में ‘ऑल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन’ के प्रेसिडेंट के तौर पर कामगारों के साथ बड़ी हड़ताल के लिए उन्हें और तमाम श्रमिकों को जेल में डाल दिया गया था।

इसके बाद 1994 ईस्वी में उन्होंने समता पार्टी की स्थापना की और इस तरीके से बाद में बाजपेयी सरकार में उन्होंने रक्षा मंत्री का पद संभाला। हालांकि बाद में तहलका नाम से घोटाला सामने आया और जॉर्ज फर्नांडिस को इस्तीफा देना पड़ा। बाद में इस आरोप से मुक्त होने के बाद उन्होंने पुनः रक्षा मंत्री पद के दायित्व को संभाला।

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राजनीति में जॉर्ज फर्नांडिस का योगदान बेहद स्पष्ट है और इसके लिए उन्हें बड़ा सम्मान भी मिला। इसके अलावा उन्होंने कई किताबों की रचना भी की, जिसके जरिए लोगों से वह जुड़े। उन्हीं के रक्षा मंत्रित्व काल में बाजपेयी सरकार द्वारा परमाणु परीक्षण भी किया गया।

इसी परिक्षण के बाद भारत ऑफीशियली एटॉमिक पावर के तौर पर जाना जाने लगा। कई मशहूर हस्तियों की तरह उनके जीवन में भी कुछ विवादित बातें जरूर रही हैं, लेकिन उन तमाम विवादों के बावजूद वह मजदूरों के नेता के रूप में याद किए जाते रहेंगे, इस बात में दो राय नहीं!