राम जेठमलानी: मशहूर कानूनविद की कहानी

अगर किसी को कानून, वकील, न्याय में जरा सी भी रूचि रही होगी, तो उसे राम जेठमलानी का नाम अवश्य ही ज्ञात होगा। यह केवल भारत के मशहूर वकील ही नहीं रहे हैं, बल्कि पूर्व केंद्रीय मंत्री भी रहे हैं। वकालत में अगर बात करें तो वह बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष पद पर भी आसीन रह चुके हैं।

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यहां तक कि वह इंटरनेशनल बार काउंसिल के भी मेंबर रहे हैं। उनकी वकालत के बारे में कुछ कहना सूरज को दिया दिखाने का समान है, क्योंकि एक से बढ़कर एक हाई प्रोफाइल केस और कंट्रोवर्सीयल मामलों की सुनवाई के लिए राम जेठमलानी को जाना जाता है।

यूं तो वह भारत के सबसे महंगे वकीलों में गिने जाते हैं लेकिन कई मामले में उन्होंने बिना पैसे लिए भी लोगों की पैरवी की है।

उनके व्यक्तिगत जीवन की बात करें तो 14 सितंबर 1923 को शिकारपुर जो अब पाकिस्तान में है वहां इनका जन्म हुआ था। इनके पिता ‘फूलचंद गुरमुखदास जेठमलानी’ थे तो माता का नाम पार्वती भूलचंद था।

कहा जाता है कि वह पढ़ाई में इतने तेज थे कि मात्र 13 साल की उम्र में उन्होंने मैट्रिक परीक्षा पास कर ली थी। 17 साल की उम्र में उन्होंने एलएलबी की डिग्री प्राप्त कर ली।

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आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि तत्कालीन समय में वकालत की प्रैक्टिस करने के लिए 21 साल की आयु सीमा रखी गई थी। लेकिन राम जेठमलानी के लिए एक विशेष प्रस्ताव लाया गया और उसके बाद इन्हें 18 की उम्र में ही प्रेक्टिस करने की इजाजत दे दी गई थी।

बाद में उन्होंने कराची के ही एस.सी. साहनी लॉ कॉलेज से एलएलबी की डिग्री भी हासिल की। व्यक्तिगत जीवन की बात करें, तो इन की दो पत्नियां थीं, दुर्गा और रत्ना साहनी। दोनों पत्नियों से इन्हें 4 बच्चे हुए जिनका नाम क्रमशः रानी, शोभा, महेश और जनक है।

इस मशहूर वकील के कैरियर की बात करें तो शुरुआत में यह प्रोफेसर थे। उसके बाद इन्होंने कराची में एक लॉ फर्म इस्टैबलिश्ड किया। 1948 में जब भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद दंगा भड़का, तब उनके मित्र और लॉ फर्म में उनके पार्टनर ए.के. ब्रोही ने उन्हें भारत जाने की सलाह दी थी।

अपने मित्र की सलाह मान कर वो भारत आ गए और 1953 में उन्होंने मुंबई के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज में टीचिंग शुरू कर दी। बाद में उन्होंने अमेरिका के वायने स्टेट यूनिवर्सिटी में कंपेरेटिव लॉ और इंटरनेशनल लॉ के भी स्टूडेंट्स को टीच किया।

उन्हें पहली बड़ी चर्चा तब मिली, जब 1959 ईस्वी में वह के.एम. नानावटी वर्सेस महाराष्ट्र राज्य के बड़े मुकदमे में अपना हाथ डाला। 1960 के दशक में उन्होंने कई तस्करों को अपनी वकालत से बचाया। इसके लिए उन्हें बदनामी भी झेलनी पड़ी थी। हालांकि इसके जवाब में उन्होंने यही कहा कि वह सिर्फ वकील का कर्तव्य निभा रहे हैं।

उनके राजनीतिक कैरियर की बात करें तो 1971 में वह पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़े लेकिन हार गए। देश में जब आपातकाल लगा था, तब उन्होंने सरकार की आलोचना की थी और सरकार की आलोचना के फलस्वरूप उनके विरुद्ध अरेस्ट वारंट जारी किया गया।

इस घटना के बाद वह देश छोड़कर कनाडा की ओर प्रस्थान कर गए। आपातकाल के बाद जेठमलानी भारत आए और उन्होंने चुनाव लड़ा। चुनाव में उन्होंने जीत भी हासिल की।

1988 में उन्हें राज्यसभा के लिए चुना गया था और 1996 में उन्होंने अटल बिहारी वाजपेई की सरकार में केंद्रीय कानून और न्याय के साथ कंपनी मामलों के मंत्री पद का पदभार संभाला।

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1998 में उन्हें शहरी मामलों के रोजगार मंत्री का पदभार दिया गया। हालांकि बाद में सर्वोच्च न्यायालय पर उनकी एक टिप्पणी के कारण उन्हें मंत्री पद छोड़ना पड़ा।

धाराओं के विपरीत चलना बेहद कठिन कार्य होता है लेकिन राम जेठमलानी ने इसकी परवाह कभी नहीं की। उनकी कोई प्रशंसा कर ले या फिर कोई आलोचना कर ले लेकिन राम जेठमलानी को अनदेखा करना नामुमकिन सा है।

कानून और न्याय के माध्यम से उन्होंने भारतीय न्याय जगत में एक विस्तृत चर्चा प्रारंभ की जिसके कई पक्षों का उन्हें क्रेडिट दिया जा सकता है।

दुनिया में ‘शांति का नोबेल’ जीतने वाले लीडर्स

कहते हैं शांति किसी भी कीमत पर सस्ती होती है!

पर यही एक चीज है जिसकी कीमत मनुष्य तब तक नहीं समझता, जब तक इसे खो नहीं देता है। इसकी कीमत समझाने वाले भी तो बेहद कम लोग हैं और संभवतः इसीलिए शांति की बात करने वाले लोगों की अहमियत कहीं भी बढ़ जाती है।

दुनिया के सबसे बड़ा पुरस्कार ‘नोबेल पुरस्कार’ भी शांति की अहमियत बखूबी समझता है और इसी अहमियत को मजबूती देने के लिए वह शांति पुरस्कारों की घोषणा करता है।

यह उन लीडर्स को सम्मानित करता है, जिन्होंने इस क्षेत्र में ना केवल कार्य किए हैं बल्कि उसका प्रभाव भी दुनिया को दिखा है। तमाम कष्ट उठाकर भी अपनी शांति की सोच से ऐसे महानायकों ने भविष्य का मार्ग प्रशस्त किया है।

आइए जानते हैं।

यूं तो नोबेल पुरस्कार फिजिक्स, केमिस्ट्री, लिटरेचर, दवाइयों इत्यादि में भी दिया जाता है लेकिन शांति के नोबेल पुरस्कारों की बात ही कुछ और है। वैसे भी अल्फ्रेड नोबेल जिन्होंने खतरनाक डायनामाइट का आविष्कार किया था, उन्होंने भी बाद में शांति की अहमियत समझा था।

कहते हैं एक बार किसी अखबार में उनकी मौत की गलत खबर छपी थी, जिसमें उन्हें ‘मर्चेंट ऑफ डेथ’, मतलब ‘मौत के सौदागर’ के नाम से संबोधित किया गया था। यही ‘अल्फ्रेड नोबेल’ के जीवन का टर्निंग प्वाइंट था और यहीं से अपने जीवन की अधिकांश पूंजी उन्होंने समाज कल्याण में लगाई और नोबेल पुरस्कारों की भी घोषणा की।

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आंग सान सू की (Aung San Suu Kyi)

शांति के लिए नोबेल पुरस्कार पाए जाने वालों में एक बड़ा नाम म्यानमार की नेता आंग सान सू की का है। म्यानमार में एक लंबे समय तक तानाशाह गवर्नमेंट थी और उसके खिलाफ संघर्ष करने का माद्दा ‘आंग सान सू की’ ने ही दिखलाया था। तमाम प्रताड़नाओं के बावजूद भी यह बहादुर महिला अपनी सोच से डिगी नहीं और अंततः उन्हें गिरफ्तार किया गया।

15 साल तक उन्होंने नजरबंदी का जीवन गुजारा, किंतु सैन्य शासन के खिलाफ लड़ने की उनकी इच्छा शक्ति कतई कमजोर नहीं हुई। 1991 में नोबेल कमेटी द्वारा ‘आंग’ का नाम नोबेल शांति पुरस्कारों के लिए आगे बढ़ाया गया और आंग इसकी पूरी हकदार भी थीं।

बाद में रोहिंग्या मुसलमानों के ऊपर आरोप लगने के कारण उनके ऊपर कई और आरोप भी लगे किंतु उनके पिछले संघर्ष को सम्मान दिए जाने की बात कही से गलत नहीं कही जा सकती है।

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कैलाश सत्यार्थी और मलाला यूसुफजई (Kailash Satyarthi , Malala Yousafzai)

भारत से नोबेल पीस प्राइस पाने वालों में कैलाश सत्यार्थी का नाम शामिल है, जिन्होंने बच्चों को शांतिपूर्ण तरीके से अपना हक दिलवाने में बड़ी भूमिका अदा की है। उनका ‘बचपन बचाओ मूवमेंट’ और ‘सेव द चाइल्डहुड मूवमेंट’ बेहद चर्चित आंदोलन थे। अपने व्यक्तिगत प्रयासों से भी कैलाश सत्यार्थी ने शांति के लिए तमाम कार्य किए। इसीलिए उन्हें मलाला यूसुफजई के साथ संयुक्त रूप से नोबेल शांति पुरस्कार मिला।

मलाला यूसुफजई की बात करें तो पाकिस्तान जैसे देश में महिलाओं के अधिकार एवं उनकी शिक्षा के लिए बोलने वाली यह सबसे पहली आवाज बनीं। मात्र 17 साल की आयु में इन्हें ‘नोबेल पीस प्राइज मिला’ तो समझा जा सकता है कि इतने रूढ़िवादी व कठोर देश में मलाला ने अपना अलग ही मुकाम बनाया है।

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बराक ओबामा (Barack Obama)

अमेरिका के अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा को भला कौन नहीं जानता? पर उनकी पहचान सिर्फ अमेरिका के राष्ट्रपति के तौर पर ही नहीं रही है, बल्कि एक बेहतरीन स्टेट्समैन की उनकी छवि उन्हें अपने तमाम पूर्ववर्ती नेताओं से अलग खड़ा करती है। कहा जाता है कि वह बराक ओबामा ही थे जिन्होंने दुनिया में कई देशों के ऊपर परमाणु हथियार से मुक्त होने का दबाव बनाया। उन्हें यह पुरस्कार 2009 में मिला था।

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लिमाह गबोवी (Leymah Gbowee)

लाइबेरिया की रहने वाली लिमाह गबोवी १७ साल की छोटी उम्र से लोगों की मदद कर रही हैं। लाइबेरिया की राजधानी मोनरोविया में आतंरिक गृहयुद्ध के कारण हालात बेहद ख़राब हो गए थे। जगह-जगह कत्लेआम और औरतों के साथ बलात्कार जैसी घटनाएं हो रही थीं।

ऐसे में लिमाह ने औरतों के हक़ के लिए आवाज उठायी और आंदोलन तक किया। लिमाह की मेहनत रंग लायी और औरतों को उनका हक़ और न्याय मिला। लिमाह के इस सराहनीय कार्य के लिए उन्हें साल 2011 में शांति पुरस्कार दिया गया।

वैसे तो इस पुरस्कार को पाने वालों की लिस्ट बहुत बड़ी है लेकिन ये चंद नाम ही काफी हैं, हमें शान्ति की अहमियत बतलाने के लिए!

आप क्या कहते हैं, कमेन्ट-बॉक्स में हमें बताएं!

कॉमेडी किंग चार्ली चैप्लिन की कहानी

चार्ली चैपलिन एक ऐसा अभिनेता थे जिन्होंने दर्द और हास्य को एक साथ दशकों तक पर्दे पर उतारा।

उनका कहना था कि ‘मुझे बारिश में चलना अच्छा लगता है, क्योंकि मेरे आंखों में आंसू हैं, जिसे बारिश में कोई देख नहीं सकता’।

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समझना मुश्किल नहीं है कि दर्द को किस हद तक इस अभिनेता ने खुद के अंदर छिपाया होगा। काली ड्रेस में छोटी मूछें और सर पर काली टोपी लगाए जब भी कोई व्यक्ति आपको दिखता होगा तो वो चार्ली चैप्लिन की ही याद दिलाता होगा!

खुद गम में डूबा हुआ, लेकिन आप को हंसाते चार्ली चैपलिन की जीवनी की बात करें तो इनका जन्म 16 अप्रैल 1889 को हुआ था और इनके बचपन का अधिकांश समय लंदन में गुजरा था। चार्ली के पिता एक शराबी आदमी थे और उन्हें और उनकी माँ को बचपन में ही छोड़कर कहीं चले गए थे।

उनकी मां ने जैसे-तैसे चार्ली चैपलिन को और उनके भाई को पाल पोस कर बड़ा किया था। अपनी मां के संघर्ष को बेहद छोटी उम्र से ही चार्ली ने देखा था।
यहां तक कि उनकी मां संघर्ष करते-करते पागल होकर मेंटल हॉस्पिटल में एडमिट हो गई थी।

चार्ली गली-गली घूम कर अपनी मां के इलाज के लिए पैसे और काम मांगते फिरते थे। चूंकि उम्र उनकी कम थी, इसीलिए कोई उन्हें काम भी नहीं दे रहा था।

आपको बताते चलें कि चार्ली का पूरा नाम ‘चार्ल्स स्पेंसर चॉपलिन’ था और चार्ली चैपलिन का नाम उन्होंने फिल्मों में मशहूर होने के लिए रखा था। बहरहाल आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि किसी भी गम में चार्ली चैपलिन ने मुस्कुराना नहीं छोड़ा। वो मुसीबतों को हँस कर अनदेखा करते थे और आगे बढ़ जाते थे।

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19 साल में चार्ली ने ‘फ्रेड कार्नो’ जो स्टेज की जानी मानी कंपनी थी, उसके साथ अमेरिका गए और यहां से फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
उनकी अदाएं और उनका दर्द भरा एहसास लोगों को हंसा-हंसा कर पेट पकड़ने पर मजबूर कर देता था, तो सोचने पर भी उतना ही मजबूर करता था!

धीरे-धीरे चार्ली बड़े स्टेज-आर्टिस्ट बन गए। इसके बाद उन्होंने फिल्मी पर्दे पर दस्तक दी और रातों – रात सुपरस्टार बन गए।

एक से बढ़कर एक हिट फिल्मों ने चार्ली चैपलिन को लोगों की जुबान पर ला खड़ा किया। उनकी मशहूर फिल्मों की बात करें तो द सर्कस, सिटी लाइट्स, द गोल्ड रश, चैपलिन आदि का नाम प्रमुख है।

बाद में उन्होंने अपनी फिल्म निर्माण कंपनी ‘यूनाइटेड आर्टिस्ट’ खड़ी की और ना केवल एक्टर बल्कि डायरेक्टर, एडिटर और स्क्रीनप्ले राइटर के रूप में खुद को पूरी तरह से स्थापित और साबित किया।

उनकी सफलता का आलम यह था कि ‘हॉलीवुड वॉक ऑफ फेम’ अवार्ड उन्हें मिला तो दूसरे कई अवार्ड भी चार्ली चैप्लिन की झोली में आ गिरे।

चार्ली चैपलिन कंट्रोवर्सीज में भी खूब फंसे। 1940 में उनकी फिल्म ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ जो एडोल्फ हिटलर पर बनी थी, उसने उन्हें विवादित कर दिया। इसके अतिरिक्त कई सारे महिलाओं के साथ उनके प्रेम-संबंध ने भी उन्हें कंट्रोवर्सी के सेंटर में ला खड़ा किया।

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मजबूर होकर उन्हें अमेरिका छोड़ना पड़ा और बाद में वह स्विट्ज़रलैंड आकर अपनी जिंदगी जीने लगे। 25 दिसंबर 1977 को स्विट्जरलैंड में ही उन्होंने अपना दम तोड़ा। हालाँकि आखिर में चार्ली चैपलिन का मृत शरीर भी चोरी हो गया था और इसके बदले चोरों ने चार्ली के परिवार से $400000 की भारी-भरकम राशि की मांग की थी।

बाद में स्विट्जरलैंड पुलिस ने चोरों को अरेस्ट किया और इस तरीके से चार्ली चैपलिन के जीवन रूपी नाटक पर अंततः पर्दा गिर गया।

बिल गेट्स: नाम ही काफी है…

अमीरों की सूची में पिछले 7 सालों से बिल गेट्स बेशक पहले पायदान से हट गए हों, लेकिन संभवतः वह पहले ऐसे मल्टी बिलेनियर रहे हैं जिन्होंने दशकों तक अमीरों की सूची में नंबर 1 के स्थान पर कब्जा जमाए रखा।

कहते हैं अट्ठारह साल बिल गेट्स ने अमीरों की सूची में नंबर एक का स्थान अपने नाम किया है। वस्तुतः अमीरों एवं अमीरी का पर्यायवाची हैं ‘बिल गेट्स’!

पर क्या वह शुरू से ही ऐसे थे? आईये जानते हैं…

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सच बात तो यह है कि बिल गेट्स के पास कॉलेज की कोई डिग्री नहीं है, बल्कि वह कॉलेज ड्रॉपआउट रहे हैं। हालांकि, उन्होंने हावर्ड यूनिवर्सिटी में कंप्यूटर साइंस और मैथ के लिए एडमिशन लिया था, पर उनका मन प्रोग्रामिंग में कहीं ज्यादा लगता था। इसीलिए उन्होंने पढ़ाई छोड़कर 1975 में ‘पॉल एलन’ के साथ माइक्रोसॉफ्ट कंपनी की स्थापना की।

हालांकि इससे पहले उन्होंने ‘ट्रैफ-ओ -डाटा’ नाम की एक कंपनी मात्र 15 साल की एज में ही शुरू कर दी थी, पर वह कंपनी बिल गेट्स को मात्र अनुभव दे सकी, सफलता नहीं।

इसके बाद माइक्रोसॉफ्ट ने तो कमाल ही कर दिया और इसी का परिणाम था कि मात्र 31 साल की उम्र में बिल गेट्स बिलेनियर बन गए थे।

1995 में माइक्रोसॉफ्ट विंडोज 95 ऑपरेटिंग सिस्टम लांच किया गया और इस ऑपरेटिंग सिस्टम ने बिल गेट्स और माइक्रोसॉफ्ट दोनों की किस्मत बदल दी।

विंडोज 95 ने ही बिल गेट्स को दुनिया का सबसे अमीर शख्स बना डाला और इसके बाद तो लगातार वह पहले स्थान पर काबिज रहे। विंडोज 95 के बाद विंडोज 98 भी बेहद सफल ऑपरेटिंग सिस्टम रहा। उसके बाद तो हर तरह के ऑपरेटिंग सिस्टम्स में माइक्रोसॉफ्ट ने अपनी बादशाहत साबित कर दी।

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हालांकि, आपको जानकर आश्चर्य होगा कि बिल गेट्स केवल एक अच्छे बिजनेसमैन ही नहीं हैं, बल्कि दुनिया में वो पूरे मनोयोग से चैरिटी करने वाले बिजनेसमैन के रूप में भी जाने जाते हैं।

‘बिल एंड मेलिंडा फाउंडेशन’ जिसकी स्थापना सन 2000 में की गई थी, उसने वर्ल्ड वाइड गरीबी, शिक्षा और आईटी सेक्टर में काम किया। बिल गेट्स ने 2008 के बाद अपना पूरा समय इस फाउंडेशन को दिया है।

भारत में यह फाउंडेशन पोलियो से मुक्ति दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुका है, तो मलेरिया इत्यादि से भी इस फाउंडेशन ने कई देशों को मुक्त कराने में सहायता की है। इसके अतिरिक्त डिमेंशिया पर भी इस फाउंडेशन का अच्छा खासा कार्य है।

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आपको यह जानकर हैरानी होगी कि वॉशिंगटन में रहने वाले बिल गेट्स के घर का टैक्स प्रत्येक साल एक मिलियन डालर का जाता है। उनका घर एक लग्जरियस आर्ट का नमूना है। हालांकि बिल गेट्स खुद सादे तरीके से रहने में विश्वास करते हैं।

जाहिर तौर पर बिल गेट्स ने सूचना प्रौद्योगिकी को जो नया आयाम दिया है, उसके लिए दुनिया उन्हें सदा-सदा के लिए याद रखेगी और उनके चैरिटी कार्यों के लिए तो समाज का हर वर्ग उनका मुरीद है ही!

जूलियन असांजे: क्रिमिनल कंप्यूटर प्रोग्रामर या क्रांतिकारी?

पिछले कई सालों में जो कुछ व्यक्ति सर्वाधिक चर्चित रहे हैं उनमें जूलियन असांज का नाम भी गिनाया जा सकता है। अमेरिका जिसे विश्व का सबसे विकसित देश माना जाता है, उसकी सुरक्षा जानकारियों को और उसकी मंशा को समस्त विश्व के सामने ला देने वाले एक ऑस्ट्रेलियाई कंप्यूटर प्रोग्रामर को अमेरिकन पुलिस हाथ पैर धोकर ढूंढती रही है।

केवल अमेरिका ही क्यों, दूसरे कई विकसित देशों की महत्वपूर्ण जानकारियां विश्व के सामने ला देने वाले असांज की कहानी बेहद दिलचस्प है।

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असांज का जन्म 3 जुलाई 1971 को ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड में हुआ था। इनकी माता एक थियेटर आर्टिस्ट के रूप में काम करती थीं, जबकि इनके पिता इनकी मां से अलग रहते थे। बाद में इनकी मां ने एक अन्य थिएटर आर्टिस्ट रिचर्ड ब्रेड असांजे से शादी की और इस रूप में जूलियन को अपने दूसरे पिता मिले।

इनकी पढ़ाई ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी और मेलबर्न यूनिवर्सिटी से हुई। पढ़ाई के दिनों में यह मेधावी विद्यार्थियों में गिने जाते थे और मैथमेटिक्स, फिजिक्स के अलावा प्रोग्रामिंग उनका पसंदीदा सब्जेक्ट था।

कंप्यूटर का तो इन्हें कीड़ा तक कहा जाता था। पढ़ाई के दौरान ही हैकिंग के गुर इन्होंने सीखने शुरू कर दिए थे और उनका साथ दे रहे थे इनके एक दोस्त ‘मेंडेक्स’। शुरुआती दौर में उन्होंने अमेरिका की कई बड़ी वेबसाइट हैक कर लिया था, पर धमाका अभी बाकी था।

2006 में विकीलीक्स के नाम से इंटरनेट की दुनिया में एक सनसनी की स्थापना हुई थी। हालांकि उस वक्त यह उतनी चर्चित वेबसाइट नहीं थी। 2010 में इस वेबसाइट का नाम पहली बार तब सुना गया जब जूलियन ने कई देशों के सीक्रेट डाक्यूमेंट्स को अपनी वेबसाइट पर लीक कर दिया था।

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यह वो डाक्यूमेंट्स थे जिन्हें सरकारें और मिलिट्री बेहद सीक्रेट के तौर पर छुपा कर रखती थीं।

दुनिया के कई देश उनके इस खुलासे से हिल गए। 12 जुलाई 2012 को अमेरिकी सेना द्वारा बगदाद में जो हवाई कार्रवाई की गई थी उससे संबंधित महत्वपूर्ण डाक्यूमेंट्स जूलियन असांजे द्वारा हैक किया गया। इसके बाद अमेरिका में तहलका मचना स्वभाविक ही था।

बताते हैं कि जूलियन को यह सारे डॉक्यूमेंट खुद अमेरिकी आर्मी में तैनात चेल्सिया मीनिंग ने प्रोवाइड कराए थे, जिन्हें बाद में यूएस आर्मी द्वारा गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया। अब जूलियन सीधे-सीधे अमेरिकी आर्मी और खुफिया एजेंसियों के टारगेट पर थे।

जूलियन असांजे को चोर, हैकर और क्रिमिनल जाने क्या क्या कहा गया और ना केवल कहा गया बल्कि उन पर इन सीरियस मामलों में केस भी चलने लगा। अमेरिकी अदालतों द्वारा जूलियन असांजे की गिरफ्तारी के वारंट इशू कर दिए गए थे।

बड़ी बात यह है कि खुद असांजे ने अपने देश ऑस्ट्रेलिया को भी नहीं बख्शा और उसके कई अहम डाक्यूमेंट्स इंटरनेट पर लीक कर दिए। यहां तक कि तत्कालीन ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड द्वारा असांजे के समस्त कार्यों को इलीगल घोषित करना पड़ा।

कई विकसित देशों की सरकारें जहां असांजे की दुश्मन बन गई वहीं दुनियाभर के लोग उनके खुलासे से उन्हें अपना हीरो समझने लगे। कई जगहों पर उनके समर्थन में लोग सड़कों पर आ गए और 2008 में उन्हें इकोनॉमिस्ट का ‘न्यू मीडिया’ अवॉर्ड मिला।

2010 में उन्हें टाइम मैगजीन द्वारा ‘रीडर्स चॉइस’ अवार्ड से नवाजा गया तो दूसरे कई देशों ने उन्हें कई सम्मान दिए। 2010 में स्वीडन गवर्नमेंट द्वारा उनके खिलाफ अरेस्ट वारंट जारी करने के बाद उनकी मुश्किलें बढ़ गयीं।

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असांजे पर आरोप लगा कि उन्होंने 2010 में दो महिलाओं का रेप किया था। बाद में असांजे को ऑस्ट्रेलिया छोड़ना पड़ा और ब्रिटेन के इक्वाडोर एंबेसी में उन्होंने शरण ली। यह राजनीतिक शरण थी। बताया जाता है कि जैसे ही जूलियन असांजे इक्वाडोर की एंबेसी से बाहर आएंगे उन्हें तत्काल गिरफ्तार कर लिया जाएगा।

किस प्रकार से बड़े देशों की निगाहों में जाना और किस प्रकार से दुनिया भर में उसे क्रांतिकारी समझा गया इस असांजे की कहानी आपको कैसी लगी, यह कमेंट बॉक्स में बताएं।

ली कुआन यू: सिंगापुर को विकसित बनाने वाला ‘कथित तानाशाह’

लीडर वही होते हैं जो अपने काम द्वारा पहचाने जा सकें और ऐसे लीडर्स में नाम आता है ‘ली कुआन यू’ का भी। आज सिंगापुर को भला कौन नहीं जानता है?

दुनिया के तमाम देश छोड़कर बड़ी और मल्टीनेशनल कंपनियां आज सिंगापुर में बिजनेस करना चाहती हैं।

निश्चित रूप से यह सिंगापुर की तरक्की और उसका बेहतरीन सिस्टम है जो इस बात को सुनिश्चित करता है। खास बात यह है कि सिंगापुर भी अंग्रेजों का गुलाम रहा था और भारत को आजादी मिलने के 18 वर्ष बाद इस देश को आजादी की सांस लेने की मोहलत मिली थी।

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ऐसे में मात्र 50 साल के आसपास सिंगापुर ने जिस ऊंचाई को छुआ है, वह दूसरे देशों के लिए एक नजीर ही है।

आप आश्चर्य ना कीजिए, यह सच है और इस सच को सच कर दिखाया है सिंगापुर के फर्स्ट प्राइम मिनिस्टर ‘ली कुआन यू’ ने। प्रधानमंत्री बनने के बाद यह 25 सालों तक कुर्सी पर जमे रहे और इसीलिए इन्हें तानाशाह की संज्ञा भी दी जाती है।

पर जो भी हो सिंगापुर को इन्होंने जिस ऊंचाई पर पहुंचाया है, इसके लिए इन महान नेता की उपाधि देना लाजमी है।

16 सितंबर 1923 को ली कुआन यू का जन्म सिंगापुर में ही हुआ था। इनके तीन भाई और एक बहन थी और यह एक अच्छे घर में पैदा हुए थे। इनकी शुरुआती शिक्षा सिंगापुर के ही ‘तेलोक कुरुऊ इंग्लिश’ स्कूल से हुई। बाद में उन्होंने ‘रैफल्स इंस्टीट्यूशन’ में एडमिशन लिया जो उस समय एक बेहतर संस्थान माना जाता था।

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तत्पश्चात सेकंड वर्ल्ड वार हुआ और ली कुआन की पढ़ाई छूट गई। 1945 में जब युद्ध समाप्त हुआ तब ली कुआन ब्रिटेन गए और वहां ‘लंदन स्कूल आफ इकोनॉमिक्स’ से लॉ की डिग्री हासिल की। 1949 में यह वापस अपने देश आये और तत्कालीन समय के बड़े लीडर जॉन लेकॉक से पॉलिटिक्स सीखा।

बाद में इसी अनुभव और इच्छाशक्ति के बल पर ‘पीपल एक्शन पार्टी’ बनाई और चुनाव में जीत हासिल कर विपक्ष के नेता बने। 1959 में इन्होंने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई और आजादी के बाद इस नेता ने सिंगापुर की कमान पूरी तरह से संभाल ली। व्यक्तिगत जीवन की बात करें तो कुआन ने 1950 में ‘क्वा गिओक चू’ ने शादी की थी।

उस समय सिंगापुर का पीएम बनना कांटों का ताज पहनना था, क्योंकि कई सारी समस्याएं देश में मौजूद थीं। सबसे पहले 1960 में हाउसिंग एंड डेवलपमेंट बोर्ड ली कुआन ने स्थापित किया ताकि सिंगापुर में जिसके पास घर नहीं है उसे घर मिले। इसके बाद ली कुआन ने रूढ़ियों से निकलकर न केवल सेना को स्ट्रांग किया बल्कि देश में अलग-अलग भाषाओं का बड़े पैमाने पर प्रचार भी किया।

इसमें चीनी मंडारिन के अलावा अंग्रेजी भाषा सिखाने पर भी अपने देशवासियों को इन्होंने जागरूक किया। कहते हैं कि ‘यूनिवर्सिटी आफ सिंगापुर’ में अंग्रेजी पढ़ाई तब तक शुरू नहीं हुई थी लेकिन ली कुआन ने उसे शुरू कराया।

इसके बाद बारी आई करप्शन के खिलाफ एक्शन की और इसमें भी ली कुआन ने जरा भी कोताही नहीं बरती।

तमाम भ्रष्ट लोगों को जेल की सलाखों के पीछे ठूस दिया गया। 1983 में सोशल डेवलपमेंट यूनिट की स्थापना करना भी एक बड़ा कार्य माना जाता है, जो सिंगापुर को शिक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था।

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इस तरह एक लंबे समय तक प्रधानमंत्री पद के दायित्व पर बने रहकर सिंगापुर को प्रगति के मार्ग पर ली कुआन ने चलाया। 1990 में इन्होंने रिजाइन कर दिया लेकिन सीनियर मिनिस्टर के तौर पर यह मंत्रिमंडल का हिस्सा बने रहे। बाद में इन्हें इंग्लैंड द्वारा ‘नाइट ग्रैड क्रॉस’ अवार्ड दिया गया जो सिंगापुर को विकसित करने के लिए मुख्य रूप से प्रदान किया गया था।

अपने जीवन के अंतिम दिनों में तकरीबन 91 साल की उम्र होने पर उन्हें निमोनिया हो गया और बाद में यह 2015 में स्वर्ग सिधार गए। पर अपने पीछे उन्होंने एक समृद्ध सिंगापुर को छोड़कर दुनिया के तमाम देशों के सामने एक नजीर पेश की, इस बात में दो राय नहीं है।

प्रणब मुखर्जी: गांधी परिवार से इतर पहचान वाला ‘कांग्रेसी दिग्गज’

भारत की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस को आजादी के बाद मुख्य रूप से गांधी परिवार के वर्चस्व वाली पार्टी माना गया। इस पार्टी में बेहद कम ऐसे नेता हुए हैं जिनकी छवि राष्ट्रीय रही हो और कांग्रेस में रहकर भी उन्होंने अपनी छवि गांधी परिवार से अलग कायम रखी हो।

प्रणब मुखर्जी उनमें से एक नाम हैं। भारत के 13वें राष्ट्रपति और भारत रत्न से सम्मानित किए जाने वाले डॉक्टर प्रणब मुखर्जी का राजनीतिक कैरियर 50 साल से अधिक का रहा है।

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आप कह सकते हैं कि एक तरह से बेदाग कैरियर रहा है उनका। प्रणब मुखर्जी ने समाज की सभी धाराओं को साथ लेकर चलने की कोशिश की और केवल कांग्रेस पार्टी में ही नहीं बल्कि दूसरे दलों में भी उनकी स्वीकृति बनी रही है।

11 दिसंबर 1935 को पश्चिम बंगाल में जन्मे प्रणब मुखर्जी के पिता आजादी के आंदोलन में सक्रिय रहे थे। उनके पिता पश्चिम बंगाल विधान परिषद के सदस्य भी रह चुके हैं। प्रणब ‘दा’ ने बीरभूम के ‘सूरी विद्यासागर कॉलेज’ से अपनी पढ़ाई पूरी की थी और इतिहास के साथ पॉलिटिकल साइंस में M.A. किया था।

कोलकाता यूनिवर्सिटी से उन्होंने एलएलबी की पढ़ाई भी पूरी की थी। तत्पश्चात कोलकाता में उन्होंने लिपिक की नौकरी की और विद्यानगर कॉलेज में राजनीति शास्त्र के टीचर बने। बाद में वह ‘देशेर डाक’ नामक पत्र से जुड़े और पत्रकार भी कहलाये।

राजनीति की बात करें तो 1969 ईस्वी में उन्होंने इस क्षेत्र में एंट्री ली और तभी इंदिरा गांधी द्वारा उनके टैलेंट को पहचान कर उन्हें राज्यसभा का मेंबर बनाया गया। इसके बाद वह कई बार राज्यसभा में अपनी गरिमामय उपस्थिति से भारतीय राजनीति को लाभान्वित करते रहे।

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इंदिरा गांधी के बेहद प्रिय थे प्रणब मुखर्जी और 1973 में उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी शामिल किया गया। हालांकि आपातकाल के दौरान उन पर राजनीतिक विरोधियों को प्रताड़ित करने के आरोप भी लगे और शाह आयोग द्वारा भी उन्हें दोषी पाया गया था। हालांकि बाद में वह पाक साफ निकल गए और फिर भारतीय राजनीति में उन्होंने अपना अमूल्य योगदान दिया।

धीरे-धीरे कांग्रेस पार्टी पर उन्होंने अपना अच्छा खासा प्रभाव जमा लिया। यहां तक कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उन्हें प्रधानमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार माना जा रहा था। लेकिन जैसे ही राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने, प्रणब मुखर्जी हाशिए पर चले गए और उन्हें मंत्रिमंडल में भी शामिल नहीं किया गया।

तब प्रणब मुखर्जी ने कांग्रेस छोड़ी और ‘राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस पार्टी’ बनाई, किंतु यह पार्टी बहुत सफल नहीं रही और 1989 में उन्होंने कांग्रेस पार्टी में ही अपने दल का विलय कर दिया।

पी वी नरसिम्हा राव सरकार में उन्हें योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनाया गया और 1995 में विदेश मंत्री के तौर पर उनकी नियुक्ति ने उनके राजनीतिक कैरियर में जान फूंक दी।

1997 ईस्वी में प्रणब मुखर्जी को बेहतरीन सांसद का पुरस्कार मिला और ऐसा माना जाता है कि सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनवाने में प्रणव मुखर्जी का खास रोल रहा।

कहा जाता है कि जब 2004 में कांग्रेस पार्टी को सरकार बनाने का मौका मिला तब एक बार फिर ऐसा माना गया कि प्रणब मुखर्जी ही प्रधानमंत्री बनेंगे क्योंकि सोनिया गांधी ने यह पद संभालने से इनकार कर दिया था।

हालाँकि इस बार भी प्रणब मुखर्जी की मंशा पूरी नहीं हुई और ‘डॉ. मनमोहन सिंह’ के रूप में देश को एक नया प्रधानमंत्री मिला। हालांकि 2012 तक वह सक्रिय रहे और कांग्रेस पार्टी के तारणहार बने रहे।

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बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आमंत्रण पर नागपुर स्थित संघ मुख्यालय में प्रणब मुखर्जी के जाने को लेकर कांग्रेस पार्टी के दूसरे नेताओं ने उनकी कड़ी आलोचना की।

सम्भवतः प्रणब मुखर्जी अनेकता में एकता और सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व देने की अपनी नीति के चलते RSS मुख्यालय में गए और वहां अपनी बात रखी। 2019 की शुरुआत में प्रणब मुखर्जी को भारत रत्न से नवाजा गया और इस तरह से भारतीय राजनीति को दिए गए उनके योगदान की चर्चा भारत के अधिकांश व्यक्ति करते हैं।

मार्क जुकरबर्ग: सोशल मीडिया का ‘किंग’

मार्क जुकरबर्ग के नाम से आज संपूर्ण विश्व में शायद ही कोई व्यक्ति अनजान होगा। सोशल नेटवर्किंग के क्षेत्र में न केवल फेसबुक, बल्कि इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप के वर्तमान मालिक मार्क जुकरबर्ग ने निश्चित तौर पर दुनिया को इंटरनेट के माध्यम से जोड़ रखा है।

पर इस लीडर की असल कहानी क्या है… यह जानना दिलचस्प रहेगा।

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अपने कॉलेज के दिनों में ही फेसबुक की सोच रखने वाले मार्क ने खुद को इस कदर स्थापित किया जो बड़े-बड़े लीडर्स के लिए एक नजीर बन गया। 14 मई 1984 को न्यूयॉर्क में पैदा हुए ‘मार्क एलियट जुकरबर्ग’ बचपन से ही होशियार बच्चों में गिने जाते थे। ना केवल पढ़ाई बल्कि खेल-कूद और खासकर कंप्यूटर में उनकी रुचि कहीं ज्यादा थी।

यहां तक कि शुरुआत में ही वह गेम्स को डिजाइन करने में अपनी रुचि दर्शाने लगे थे। कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के माध्यम से मार्क जुकरबर्ग ने जल्द ही अपने सर्कल में एक खास स्थान अर्जित कर लिया था।

मार्क की इस प्रतिभा को उनके पिता ने जल्दी ही पहचाना और मात्र 6 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने बच्चे के लिए कंप्यूटर प्रोग्रामिंग पढ़ाने वाला ट्यूटर अरेंज कर दिया था। इस तरह से शुरुआत से ही वह किसी दक्ष कंप्यूटर प्रोग्रामर की भांति कंप्यूटर प्रोग्राम्स लिखने लगे थे।

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आप कंप्यूटर प्रोग्रामिंग में उनकी रुचि को इस बात से ही जान सकते हैं कि स्कूल के दिनों में ही उन्होंने मीडिया प्लेयर की डिजाइन एक प्रोफेशनल म्यूजिक कंपनी ‘इंटेलिजेंट मीडिया ग्रुप’ के लिए कर डाली थी। इतना ही नहीं मशहूर कंप्यूटर पत्रिका ‘पीसी’ द्वारा इस प्रोग्राम को पांच में से तीन रेटिंग दिया गया था।

बाद में मार्क ने अमेरिका के हावर्ड यूनिवर्सिटी में एडमिशन लिया, लेकिन क्लास में जाने की बजाय वह हॉस्टल में रहकर प्रोग्रामिंग में ही खुद को खपाये रहते थे। जाहिर तौर पर उनकी इस आदत से कई दोस्त उन्हें पागल समझने लगे थे, लेकिन उन दोस्तों को मार्क की दीवानगी का पता तब चला जब ‘फेसमैश’ नामक सॉफ्टवेयर से मार्क ने कॉलेज के स्टूडेंट्स को आपस में चैटिंग का प्लेटफार्म उपलब्ध कराया।

जाहिर तौर पर मार्क की प्रशंसा फैल गई, लेकिन कॉलेज प्रशासन ने मार्क पर दबाव देकर इसे बंद करा दिया था।

मार्क को ना रुकना था और वह रुके भी नहीं!

बल्कि 4 फरवरी 2004 को “फेसबुक” नामक सोशल मीडिया साइट बनाई और कॉलेज में यह खबर बेहद तेजी से फैल गई। जल्द ही हावर्ड के 12 सौ से अधिक स्टूडेंट्स ने इस पर अपनी प्रोफाइल बनाई और इसकी लोकप्रियता तेजी से आगे बढ़ने लगी।

इसकी लोकप्रियता बढ़ ही रही थी, ठीक तभी कुछ सीनियर्स ने मार्क जुकरबर्ग पर अपनी साइट के लिए धोखा देकर कोडिंग कराने का आरोप लगाया और इन आरोपों की जांच के बाद मार्क को कॉलेज छोड़ना पड़ा। इन तमाम मुसीबतों के बावजूद भी मार्क रुके नहीं और अपने कुछ बैचमेट्स के साथ उन्होंने एक कंपनी बनाई और कुछ ही सालों में फेसबुक मशहूर हो गया।

वहीं 2017 में हावर्ड यूनिवर्सिटी ने खुद मार्क जुकरबर्ग को बुलाकर उन्हें डिग्री प्रदान किया।

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बस फिर क्या था… मार्क जुकरबर्ग मिलियंस और बिलियंस में खेलने लगे, लेकिन मार्क की सफलता सिर्फ फेसबुक तक ही सीमित नहीं रही। बाद में उन्होंने इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप का अधिग्रहण कर सोशल मीडिया के क्षेत्र में एक तरह से मोनोपोली स्थापित कर दी। यह तीनों बड़ी सोशल साइट्स अपने फील्ड में सबसे ऊपर बरकरार हैं।

जिस तरीके से जुकरबर्ग ने अलग-अलग समय पर इनोवेशंस किए, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि सोशल मीडिया के क्षेत्र में अभी मार्क के वर्चस्व को चुनौती देने वाला कोई दूसरा खिलाड़ी मौजूद ही नहीं है।

हालाँकि फेसबुक पर प्राइवेसी को लेकर कई सारे आरोप लगे और कई जगहों पर उसे जुर्माना भी भरना पड़ा। लेकिन मार्क जुकरबर्ग के सफर पर इन सारी चीजों का कोई असर नहीं पड़ा और यही वह खास बात है जो मार्क जुकरबर्ग की सफलता से हमको सीखनी चाहिए क्योंकि उनका शो हमेशा ही चलता रहा है।

बराक ओबामा: अमेरिका का पहला अश्वेत राष्ट्रपति जिसने मजबूत छाप छोड़ी

यह बहुत दिनों की बात नहीं है!

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से पहले ही अमेरिका में बराक ओबामा राष्ट्रपति पद पर आसीन थे। उन्होंने अपनी कार्यशैली से अमेरिका को काफी हद तक मजबूती प्रदान की। बराक ओबामा का राष्ट्रपति बनना ना केवल अमेरिका की मजबूती से संबंध रखता है, बल्कि करोड़ों अश्वेत लोगों की उम्मीद से भी इसका गहरा सम्बन्ध है।

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अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने अपने गरिमापूर्ण व्यवहार से अपना कद और भी ऊंचा कर लिया। 4 अगस्त, 1961 को हवाई के होनोलुलु में जन्मे ‘बराक हुसैन ओबामा’ अमेरिका के 44 वें तथा पहले अश्वेत राष्ट्रपति थे। राष्ट्रपति के रूप में बराक ओबामा के कार्यकाल को हमेशा याद किया जायेगा।

वहीं ओबामा का भारत के प्रति लगाव भी किसी से छुपा नहीं है। कहते हैं बराक ओबामा के कार्यकाल का भारत-अमेरिका संबंध पर बड़ा असर पड़ा था। बराक ओबामा भारत के साथ अपने रिलेशन को बेहद गंभीरता से लेते थे और यह उन्होंने छिपाया भी नहीं।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें अपना दोस्त मानते थे और दोनों के बीच की केमिस्ट्री किसी से छुपी हुई नहीं थी।

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यह केमिस्ट्री केवल दिखावटी नहीं थी, बल्कि ओबामा के प्रशासन के दौरान भारत और अमेरिका के बीच 74 लाख करोड़ रुपए से अधिक का बिजनेस हुआ जो उनके पहले के कार्यकाल की तुलना में 5 गुना अधिक था।

इसके अतिरिक्त दोनों देशों के यात्री एक दूसरे देशों में अधिक संख्या में गए जो एक रिकॉर्ड माना जाता है।

इसके अतिरिक्त एफडीआई, डिफेंस, जॉब एजुकेशन इत्यादि सेक्टर्स में भी भारत और अमेरिका काफी करीब रहे हैं।

राष्ट्रपति ओबामा की बात करें तो उन्हीं के शासनकाल के दौरान अलकायदा का खूंखार आतंकवादी ओसामा बिन लादेन मारा गया और उन्हीं के कार्यकाल में इस्लामिक स्टेट जैसे आतंकवादी संगठन नियंत्रण में रहे। इतना ही नहीं, बराक ओबामा के शासनकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि अमेरिका द्वारा क्यूबा और इरान से रिश्ते सुधारने को भी माना जाता है।

कहते हैं कि इससे पहले क्यूबा और अमेरिका दुश्मनी की अवस्था में थे, लेकिन ओबामा प्रशासन ने इस स्थिति को दूर किया।

इतना ही नहीं ईरान के साथ ही अमेरिका ने बेहद महत्वपूर्ण परमाणु समझौता किया, जो तमाम यूरोपीय और रूस, चीन इत्यादि देशों की सहमति से हुआ था। हालांकि बाद में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने इस समझौते को तोड़ दिया।

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राष्ट्रपति ओबामा द्वारा आम अमेरिकियों को दी जाने वाली हेल्थ केयर योजना की भी काफी चर्चा हुई। हालांकि बाद में डोनाल्ड ट्रंप ने इसमें कटौती की।

ओबामा के जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष उनकी पत्नी मिशेल ओबामा को भी माना जाता है। कहते हैं परिवारिक छवि के तौर पर जिस प्रकार का रिश्ता बराक ओबामा ने मिशेल ओबामा और अपनी बेटियों साशा और मालिया के साथ निभाया वह एक बेहतरीन उदाहरण है।

इसके अतिरिक्त भी बराक ओबामा ने कई ऐसे प्रतीकात्मक और वास्तविक कार्य किए जो उनके कार्यकाल को तमाम अमेरिकी राष्ट्रपतियों से अलग रखते रहेंगे।

नेटफ्लिक्स: डिजिटल रिवोल्यूशन की कहानी

आज नेटफ्लिक्स का नाम भला कौन नहीं जानता है? भारत में तो सैक्रेड गेम्स के आने के बाद इसका नाम हर जुबान पर छाया हुआ है। सैक्रेड गेम्स के पहले सीजन के बाद ही इसकी लोकप्रियता जबरदस्त ढंग से बढ़ गई।

हालाँकि नेटफ्लिक्स पहले से ही एक वैश्विक ब्रांड के रूप में स्थापित हो चुका था, पर यह इतना बड़ा ब्रांड बना कैसे और क्या या शुरू से ही तरह बड़ा ब्रांड था यह जानना दिलचस्प रहेगा।

आखिर ऑनलाइन स्ट्रीमिंग सर्विस में लीडरशिप स्थापित करने वाली नेटफ्लिक्स की कहानी कोई आम कहानी तो है नहीं!

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दुनिया भर के 100 से अधिक देशों में तकरीबन 100 करोड़ के आसपास के कंजूमर नेटफ्लिक्स से जुड़े हुए हैं।

नेटफ्लिक्स सर्विस का इस्तेमाल लैपटॉप, टैबलेट, स्मार्टफोन और इंटरनेट कनेक्शन के जरिए जुड़ी किसी भी डिवाइस में यह इस्तेमाल किया जाता है। टेलीविजन के लिए इसमें एक डिवाइस लगाने की आवश्यकता होती है।

इसकी शुरुआत की बात करें तो 1997 में जब दुनिया भर में सीडी और डीवीडी का जमाना चल रहा था, तब नेटफ्लिक्स द्वारा ऑनलाइन डीवीडी बेचने की सर्विस शुरू की गई। रीड हेस्टिंग्स और मार्क रंडोल्फ़ द्वारा 29 अगस्त 1997 को कैलीफोर्निया में इसकी शुरुआत की गई थी।

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यह वह समय था जब इंटरनेट धीरे-धीरे अपना पांव पसार रहा था। उस समय ऑनलाइन डीवीडी की दुकान के नाम से नेटफ्लिक्स जाना जाने लगा था। इसके बाद इसने वीडियो ऑन डिमांड सर्विस स्टार्ट की और फिर 2007 में इनके द्वारा स्ट्रीमिंग सर्विस की शुरूआत कर दी गई।

साल 2012 आते आते यह मार्केट में अपना रंग दिखाने लगा था। यहीं से ओरिजिनल सीरीज का निर्माण भी शुरू हो गया और पहला सीरीज था ‘लिली हैमर’। यह सुपरहिट वेब सीरीज साबित हुई और 2016 में यह कंपनी ओरिजिनल कंटेंट देने वाले प्रोवाइडर्स में एक नंबर पर पहुंच गई।

भारत में इसकी शुरुआत 2016 में हुई और कुछ ही समय बाद ‘सेक्रेड गेम्स’ नामक सीरीज रिलीज करके नेटफ्लिक्स ने भारतीय यूजर्स के मन मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ा। उसके बाद तो इस पर ओरिजिनल शोज की भरमार हो गई। खासकर भारत में जियो की इंट्री के बाद नेटफ्लिक्स का प्रसार बेहद तेजी से आगे बढ़ा।

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पहले 1 महीने के लिए फ्री सर्विस देकर नेटफ्लिक्स ने इंडियन यूजर्स को अपना स्वाद चखाया। उसके बाद तो लोग इसका सब्सक्रिप्शन तेजी से लेने लगे और फिर उसके बाद यह कदम-दर-कदम आगे बढ़ने लगी।

ऑनलाइन स्ट्रीमिंग सर्विस की लीडर नेटफ्लिक्स की ये कहानी कैसी लगी कमेंट बॉक्स में अपने विचार बताएं।