ओयो रूम के संस्थापक रितेश अग्रवाल की ‘बड़ी कहानी’

बिजनेस कई लोग करते हैं लेकिन उनमें कुछ ही सफल होते हैं। कुछ सफल लोगों में से भी बहुत कम संख्या में ऐसे लोग होते हैं जो अपने बिजनेस के विस्तार को वैश्विक स्तर पर आकार दे पाते हैं। बिल्कुल बेसिक आइडिया के साथ होटल इंडस्ट्री को बदल देने वाले रितेश अग्रवाल उन्हीं चंद लोगों में शामिल हैं, जो ना केवल खुद सफल रहे बल्कि अपने बिजनेस को ग्लोबल लेवल पर भी लेकर गए।

21 साल के रितेश अग्रवाल की कहानी कोई साधारण कहानी नहीं है। आखिर भेड़ चाल से अलग चलना भला कितने लोग सोच पाते हैं?
हालाँकि, किसी आम बच्चे जैसा इनका भी बचपन था और 12वीं तक की पढ़ाई इन्होंने ज़रूर पूरी की, लेकिन चूंकि रितेश अग्रवाल व्यापारिक मारवाड़ी फैमिली से आते थे, इसीलिए इनके पिता इनसे दुकान खोल कर उस पर बैठने की जिद करने लगे थे।

हालांकि बड़े लोग छोटी चीजों में खुद को इन्वोल्व नहीं करते हैं, इसीलिए यह भागकर कोटा आ गए और वहां यह आईआईटी कोचिंग करने लगे। बाद में आईआईटी कोचिंग को छोड़कर वह दिल्ली के एक बिजनेस स्कूल में दाखिल हो गए और तमाम बिजनेस सेमिनारों में अपनी सोच को नया आयाम देने लगे।

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उन्होंने एनालाइज किया कि बिजनेस सेमिनार जो बड़े-बड़े शहरों में होती थी उसके लिए लोगों को महंगे होटल्स में रुकना पड़ता था और ज्यादा पैसे देने के बावजूद उन्हें अच्छी सर्विस नहीं मिलती थी।

बस यहीं से उनके दिमाग में नया स्टार्टअप शुरू करने का आईडिया आ गया और 2012 में आरवेल स्टेस नामक स्टार्टअप शुरू कर दिया।

इसके लिए उन्होंने अपना सब कुछ झोंक दिया था और इसके लिए उन्हें वेंचर नर्सरी से ₹3000000 का इन्वेस्टमेंट भी मिला। इसी प्रकार थीम फैलोशिप से उन्होंने 66 लाख रुपए की राशि भी जुटाई, लेकिन उनका पहला स्टार्टअप धीरे-धीरे घाटे में जाने लगा। चारों तरफ से आलोचनाएं होने लगीं और इस बिजनेस और घाटे को एनालाइज करते हुए रितेश ने समझ लिया कि ग्राहकों की जरूरत को समझना ज्यादा आवश्यक है।

इन्हीं सब आइडियाज के बीच 2013 में आरवेल स्टेस का नाम बदलकर ओयो रूम्स किया गया जिसका मीनिंग होता है आपके अपने कमरे। रितेश अग्रवाल ने ग्राहकों को सुविधाएं देने पर ज्यादा ध्यान केंद्रित किया और ग्राहकों तक बात पहुंची गई कि ओयो रूम्स में कम पैसे में ही बेहतर सुविधा वाली जगह उपलब्ध है।

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बस फिर क्या था दिन दूनी और रात चौगुनी रफ्तार से उनका यह वेंचर आगे बढ़ने लगा और 2014 में डीएसजी कंजूमर पार्टनर्स ने चार करोड़ का भारी-भरकम इन्वेस्टमेंट किया। फिर 2016 में सॉफ्टबैंक ने इसमें 7 अरब रुपए का इन्वेस्टमेंट किया और अब यह कंपनी ना केवल भारत में बल्कि मलेशिया इत्यादि दूसरे देशों में भी स्थापित होने लगी है। कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि जो लोग अपने सपनों पर भरोसा रखते हैं वह ना केवल खुद को बल्कि दुनिया को भी राह दिखलाते हैं और रितेश अग्रवाल भी उनमें से एक हैं।

चंद्रशेखर आजाद: गांधीवादी से क्रांतिकारी बनने तक का ‘सफ़र’

यह ऐतिहासिक तथ्य तो सबको पता ही है कि 1920 में महात्मा गांधी द्वारा चलाए जा रहे असहयोग आंदोलन से एक 14 साल का क्रांतिकारी बच्चा निकला, जिसने जज के सामने बेखौफ होकर अपना नाम आजाद, पिता का नाम स्वाधीन और घर का पता जेलखाना बताया। यह 14 साल का छोटा बच्चा जो उस वक्त महात्मा गांधी की राह पर चलकर असहयोग आंदोलन कर रहा था, वह गांधीवादी था।

बाद में चलकर वही लड़का महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद के रूप में विख्यात हुआ। पर ऐसा क्या हुआ कि यह छोटा बच्चा आगे चलकर गांधीवादी राह की बजे क्रांतिकारी के रूप में देश की आजादी के लिए लड़ा, आइए जानते हैं-

23 जुलाई 1906 को मध्यप्रदेश के झाबुआ तहसील और उसके भावरा गांव में पंडित सीताराम तिवारी के घर चंद्रशेखर तिवारी का जन्म हुआ था। बचपन से ही वह तीरंदाजी, कुश्ती-कसरत इत्यादि करते थे। परिवार उनका गरीब था, इसलिए शुरुआत में उन्होंने तहसीलदार के यहां नौकरी की और अपनी भूख मिटाने के लिए वह जंगलों में शिकार भी करते थे।

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चूंकि वह आजाद ख्याल के व्यक्ति थे, इसीलिए पारिवारिक दबाव में जरूर उन्होंने कुछ देर नौकरी की, लेकिन बाद में मनमुटाव के कारण वह नौकरी छोड़कर बनारस की ओर निकल पड़े। बाद में बनारस की संस्कृत पाठशाला में उनका दाखिला उनके फूफा जी पंडित शिव विनायक मिश्र ने कराया, किंतु घुमक्कड़ प्रवृत्ति के चंद्रशेखर आजाद का मन पढ़ाई में भी नहीं लगा।

इसी समय के आसपास भारत के इतिहास में 1919 में जालियांवाला बाग का दर्दनाक कांड हुआ, जिसमें अंग्रेजी हुकूमत ने मासूम भारतीयों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाई थीं। इसी का विरोध करने के लिए महात्मा गांधी ने समस्त देश में असहयोग आंदोलन शुरू किया था और चंद्रशेखर आजाद इसी आंदोलन में प्रदर्शनकारी बनकर भाग ले रहे थे। उन्हें गिरफ्तार किया गया था और जज के सामने उन्होंने अपना नाम ‘आजाद’ बताया।

यहीं से चंद्रशेखर तिवारी बाकी लोगों के लिए चंद्रशेखर आजाद बन गए थे। जेल से रिहा होने के पश्चात बाहर निकलने पर बनारस की गलियों में आजाद-आजाद कह कर उनका स्वागत होता था।

महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से अंग्रेजों को दिक्कत ज़रूर हुई थी, लेकिन अचानक महात्मा गांधी ने 1922 में असहयोग आंदोलन समाप्त कर दिया जिसकी वजह चंद्रशेखर आजाद नहीं समझ पाए। इसका उनके दिलो-दिमाग पर गहरा असर पड़ा और यहीं से उन्होंने देश की आजादी के लिए हथियार उठा लिया। हथियार उठाने के पश्चात वह हिंदुस्तान रिपब्लिकन पार्टी में जुड़ गए और पहला बड़ा कार्य चंद्रशेखर आजाद और उनके क्रांतिकारी मित्रों ने 1925 में किया।

काकोरी रेलवे स्टेशन जो लखनऊ के पास स्थित है, उसमें सवारी गाड़ी को रोककर सरकारी खजाना लूट लिया गया। बताया जाता है कि इस मामले में 40 से अधिक क्रांतिकारी अरेस्ट किए गए थे, लेकिन चंद्रशेखर आजाद इससे बचे रहे। इसी लूट कांड में अशफाक उल्ला खान, राम प्रसाद बिस्मिल और ठाकुर रोशन सिंह के साथ राजेंद्र नाथ लाहिड़ी को 1927 ईस्वी में फांसी दी गई थी और बाकी कई लोगों को काला पानी भेजा गया था। इस घटना के बाद चंद्रशेखर आजाद का ऑर्गेनाइजेशन कमजोर पड़ने लगा किंतु चंद्रशेखर आजाद ने बखूबी अपने संगठन को संभाला।

गणेश शंकर विद्यार्थी उस समय प्रताप अखबार चलाते थे और इसी के माध्यम से चंद्रशेखर आजाद का परिचय भगत सिंह से हुआ। दोनों का मकसद एक था और हिंदुस्तान रिपब्लिकन संगठन बाद में नाम बदलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन किया गया।

इसके बाद साइमन कमीशन भारत आया, जिसका विरोध करने के दौरान लाला लाजपत राय घायल हुए और बाद में मृत्यु को प्राप्त हो गए। इसका बदला लेने के लिए भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 1929 को लाहौर की केंद्रीय असेंबली में बम फेंका था और अपनी गिरफ्तारी दी थी।

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इसके विरोध में चंद्रशेखर आजाद ने कई प्रयास किये और अंग्रेज सरकार की नाक में दम कर दिया। तमाम प्रयासों के बावजूद भी वह अंग्रेज अधिकारियों के हाथ नहीं आए। बाद में 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में वह अपने क्रांतिकारी मित्रों से मिलने गए थे तो इसकी मुखबिरी किसी ने अंग्रेजों से कर दी थी। यहीं पर मशहूर गोली कांड हुआ और आजाद अकेले अंग्रेजों का मुकाबला करते रहे।

अपने लिए उन्होंने एक गोली बचा रखी थी और उन्होंने जाते-जाते अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर ली कि वह ताउम्र आज़ाद ही रहे थे और आजाद ही मरे।

बेंजामिन फ्रैंकलीन: फादर आफ यूनाइटेड स्टेट्स

“फादर ऑफ यूनाइटेड स्टेट्स”… यह कोई साधारण उपाधि नहीं है!
पर आप यह जान लें कि इस उपाधि को धारण करने वाले बेंजामिन फ्रैंकलीन भी कोई साधारण व्यक्ति नहीं रहे हैं, बल्कि उन्होंने अपने जीवन में ऐसे कई असाधारण कार्य किए हैं, जिनकी जितनी भी चर्चा की जाए कम होगी।

कुछेक बातों की चर्चा करें तो बिजली क्यों कड़कती है और इससे बड़ी-बड़ी बिल्डिंगों को किस प्रकार बचाया जा सकता है, इसका मेथड बेंजामिन फ्रैंकलीन ने ही इजाद किया था। इतना ही नहीं, बाई फोकल ग्लास, गाड़ी के ओडोमीटर और ग्लास ‘आर्मोनिका’, फ्रैंकलीन स्टोव इत्यादि के आविष्कार के जिम्मेदार बेंजामिन फ्रैंकलीन ही हैं। इनके गुणों की जितनी भी बात की जाए, कम है, क्योंकि ना यह केवल वैज्ञानिक बल्कि लेखक, प्रकाशक, एक बड़े राजनेता और सफल राजनयिक के तौर पर भी इनकी खासी पहचान है।

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इनकी कहानी की बात करें तो 17 जनवरी 1706 ई. में यह बोस्टन में पैदा हुए थे। बेंजामिन के पिता जॉनजिया मोमबत्ती और साबुन का बिजनेस करते थे। उनकी दो पत्नियां और 15 बच्चे थे। बेंजामिन की शुरुआती पढ़ाई बोस्टन के एक लैटिन स्कूल से शुरू हुई थी, किंतु बाद में यह अपनी पढ़ाई छोड़ कर पिता के बिजनेस में लग गए।

कम उम्र में ही बड़ा सोचना इनकी फितरत थी और इसके लिए उन्होंने खुद को पूरी तरह झोंक दिया। मात्र 12 साल की उम्र में अपने भाई के साथ प्रिंटिंग के कारोबार में उतर गए थे। हालांकि अपने भाई के साथ उनकी अनबन ही रही और यह बिजनेस ज्यादा नहीं चला, लेकिन छोटी उम्र में ही वह अखबार पब्लिश करने की तमाम बारीकियां समझ गए थे।

बाद में वह बोस्टन चले गए, जहां जान रीड के मकान में वह रहने लगे। अपने मकान मालकिन की बेटी देबारोह के साथ वह प्रेम में पड़ गए और बाद में उन्होंने शादी कर ली। हालांकि वह शादी टूट गई लेकिन कुछ दिनों बाद दोबारा देबरोह को ही अपनी पत्नी बनाया। शादी के बाद वह फिलाडेल्फिया में शिफ्ट हो गए थे और यहीं उन्होंने प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना की और दी पेंसिलवेनिया गजट प्रकाशित करने लगे थे।

1752 ईस्वी में उन्होंने पतंग की सहायता से आसमानी बिजली से बड़ी बिल्डिंग को बचाने का नुकशा खोज निकाला था। इसमें उनके अनुसार लोहे की एक पतली लंबी छड़ अगर जमीन में धंसी हो, जबकि उसी छड़ का कुछ हिस्सा बाहर निकला हो। उस छड़ से आप 1 फुट लंबा पीतल का तार बांध दें तो इससे अकाशीय बिजली से भवनों को बचाया जा सकता है। जाहिर तौर पर तत्कालीन समय में यह एक बड़ा आविष्कार था।
इसी प्रकार आम आदमी से जुड़े कई आविष्कार बेंजामिन फ्रैंकलीन ने किए।

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आविष्कारों के अतिरिक्त शतरंज भी उनके चहेते खेलों में था और इसके वह मशहूर खिलाड़ी थे। शतरंज के खिलाड़ी के अलावा वह मशहूर राजनेता भी रहे और कांग्रेस का सदस्य बनने से लेकर अमेरिका का पहला पोस्ट मास्टर जनरल बनना, अमेरिका की ओर से फ्रांस और स्वीडन में कमिश्नर बनना, उनकी महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल है। 1750 ईस्वी तक फ्रांस में रहकर जिस समझदारी से उन्होंने अपने देश के कामकाज को देखा, उसके लिए उन्हें ‘फादर आफ अमेरिका’ की श्रेणी में स्थान दिया गया। 17 अप्रैल 1790 को इनकी मौत हो गई थी, लेकिन जाने से पहले अपने तमाम आविष्कारों और उपलब्धियों को मानवता के लिए समर्पित करके गए थे।

के. कामराज: बड़े नेता की बड़ी कहानी

के. कामराज के बारे में आप इतना ही समझ लीजिए कि इन्होंने देश को दो-दो प्रधानमंत्री दिए हैं। जी हां! वर्तमान समय में जिस तरह से जोड़-तोड़ की राजनीति हो रही है, उससे इतर के. कामराज अपने उसूलों के पक्के माने जाते रहे हैं और इसी वजह से यह कांग्रेस पार्टी के महत्वपूर्ण पिलर्स में भी शामिल रहे हैं। आइए जानते हैं इनकी कहानी-

कांग्रेस पार्टी आज बेशक अच्छी हालत में ना हो, लेकिन कभी इसकी तूती बोलती थी और इसी के नेता थे के. कामराज। कुमारस्वामी कामराज का जन्म 15 जुलाई 1930 को तमिलनाडु में एक बिजनेस फैमिली में हुआ था। वह आजादी की लड़ाई में भी शामिल रहे थे। महात्मा गांधी से काफी प्रभावित होकर वह असहयोग आंदोलन में भी शामिल हुए थे और बाद में 1930 में नमक सत्याग्रह में भी उन्होंने हिस्सा लिया।

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नमक-सत्याग्रह के दौरान वह गिरफ्तार भी किए गए, लेकिन यह तो शुरुआत थी। बाद के अपने जीवन में वह 6 बार गिरफ्तार किए गए और इसी कड़ी में उन्हें महीनों तक जेल में रहना पड़ा था। जेल में रहने के दौरान ही वह म्युनिसिपालिटी के चेयरमैन बन गए थे, किंतु बाद में इस पद से उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

के. कामराज अपनी योजनाओं और शातिर दिमाग के लिए जाने जाते हैं। आजादी के बाद 13 अप्रैल 1954 को वह मद्रास राज्य के चीफ मिनिस्टर बने और उन्होंने एजुकेशन पर अच्छा खासा काम किया। उन्होंने एक 11वीं तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा जैसी योजना को भी अपनी सरकार में लागू किया और शायद इसी का परिणाम था कि वह 3 बार अपने राज्य के मुख्यमंत्री बने। हालांकि 1962 में तीसरी बार चीफ मिनिस्टर पद से उन्होंने इस्तीफा दे दिया था और संगठन में रहकर ही काम करने लगे थे।

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उनका एक आईडिया ‘कामराज प्लान’ बड़ा मशहूर हुआ, जिसके अनुसार उन्होंने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को अपने मंत्रियों से इस्तीफा दिलवा कर आम जनता के बीच जाने की सलाह दी थी। नेहरू ने उनकी सलाह को माना और इसका उन्हें खासा फायदा भी मिला। जब 1964 में जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु हो गई, तब कांग्रेस पार्टी में अध्यक्ष पद की लड़ाई तेज हो गई, लेकिन कामराज के नेतृत्व में सिंडिकेट गुट ने शास्त्री जी को अपना समर्थन दे दिया था।

1966 में लाल बहादुर शास्त्री की भी मृत्यु हो गई और मोरारजी देसाई तब प्रधानमंत्री बनना चाहते थे लेकिन के. कामराज ने इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए अच्छा खासा प्लान किया और उनका प्लान सक्सेस भी रहा।

इस बीच के. कामराज को ही प्रधानमंत्री पद के लिए कई लोगों ने आगे बताया लेकिन उन्होंने अपनी हिंदी और अंग्रेजी ठीक से ना आने पाने के कारण जनता से सीधा कनेक्ट करने में खुद को असमर्थ बता कर अपना नाम वापस ले लिया। तब के समय में यह बहुत बड़ी बात थी।

हालांकि उनके आलोचक कांग्रेस पार्टी में बंटवारे के लिए भी उन्हीं को जिम्मेदार मानते हैं और इस बंटवारे के बाद वह केंद्रीय राजनीति से दूर वापस तमिलनाडु चले गए थे।

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बाद में 2 अक्टूबर 1975 को हार्ट अटैक के कारण उन्होंने इस असार-संसार को छोड़ दिया। संसार से जाने से पहले के. कामराज ने केंद्रीय राजनीति से लेकर राज्य की राजनीति तक में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई, इस बात में दो राय नहीं।

जनरल बरार: ब्लू स्टार के ‘सैन्य नायक’

6 जून को भारतीय सेना ने ऑपरेशन ब्लूस्टार को अंजाम दिया था। ऑपरेशन ब्लू स्टार के बारे में आप सब ने जरूर सुना होगा, क्योंकि इसी ऑपरेशन के कारण भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हुई और इसी ऑपरेशन के कारण समूचे देश में सिख विद्रोही दंगे भड़क उठे थे। ऐसे में प्रश्न उठता है कि जनरल बरार कौन थे और उन्होंने यह सब किया कैसे, आइए जानते हैं-

जनरल बरार का पूरा नाम कुलदीप सिंह बरार था और इनका जन्म पंजाब के ही एक सिख परिवार में हुआ था। उनका परिवार अच्छी हैसियत वाला परिवार था। संभवतः इसीलिए वह देहरादून के बोर्डिंग स्कूल से अपनी पढ़ाई पूरी कर सके थे। घर में माहौल सख्त था, क्योंकि बरार के पिताजी फौज में एक अफसर थे।

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कुलदीप अपने पिताजी से बेहद प्रेरित थे, क्योंकि उनके पिता ने सेकंड वर्ल्ड वार में बड़ा साहस दिखलाया था। इसी प्रेरणा के फलस्वरुप कुलदीप बरार भी 20 साल की उम्र में ही फौज में भर्ती हो गए और उन्हें मराठा लाइट इन्फेंट्री में लेफ्टिनेंट का पद मिला। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उन्हें बड़ी जिम्मेदारी दी गई थी, जिसमें वह इन्फेंट्री बटालियन को लीड कर रहे थे।

इस मिशन में वह कामयाब हुए थे और इसी के फलस्वरूप भारत सरकार ने वीर चक्र से उन्हें सम्मानित किया इसके अलावा भी उन्हें 1971 के वार में दूसरी जिम्मेदारियां भी मिलीं, जिसे उन्होंने बखूबी निभाया।

पंजाब की बात करें तो 1970 के दशक में अकाली एक स्वायत्त राज्य की मांग करने लगे थे, जिसके कारण पंजाब सुलगने लगा था। अकालियों की मांग से युवा पहले से ही उद्वेलित थे और इसका फायदा उठाया एक बेहद कठोर सरदार जनरैल सिंह भिंडरावाले ने। यह खुद को दमदमी टकसाल नामक शैक्षणिक संगठन का नेता बताता था और सरकार के प्रति इसने बेहद कड़ा रुख अपनाकर सिक्ख युवाओं को भड़काने का काम किया।

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फलस्वरूप पंजाब में हिंसा होने लगी और सिखों के अलावा दूसरी कम्युनिटी पर भिंडरवाले के लोग अत्याचार करने लगे। यह सारी परिस्थिति देख कर पंजाब में राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा कर दी गई और पंजाब में राष्ट्रपति शासन लग गया। उधर जनरैल सिंह भिंडरावाले ने भी आतंकी रास्ता अपनाते हुए अमृतसर के स्वर्ण मंदिर और अकाल तख्त कंपलेक्स पर कब्जा कर लिया था और इसी वजह से भारतीय सेना को ऑपरेशन ब्लू स्टार करना पड़ा।

जनरल कुलदीप सिंह बरार को इसकी जिम्मेदारी दी गई और उस वक्त जनरल मेरठ में एक बटालियन को लीड कर रहे थे। 1 महीने की छुट्टी के लिए उन्होंने अप्लाई किया था, लेकिन इस बीच छुट्टी कैंसिल हुई और मिला अमृतसर जाने का आदेश।

जनरल बरार उस स्थान पर पहुंचे और पूरे गुरुद्वारे के इर्द-गिर्द घूम कर उन्होंने वस्तु स्थिति समझने की कोशिश की। वह समझ गए थे कि आतंकवादियों ने जान-बूझकर स्वर्ण मंदिर परिसर का चुनाव किया है। आतंकी यह मान रहे थे कि लोगों की आस्था के कारण सेना स्वर्ण मंदिर में नहीं जाएगी।
पर जनरल तो फिर जनरल थे!

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जनरल बरार ने दोपहर तक आतंकवादियों को सरेंडर करने को कहा लेकिन आतंकवादी नहीं माने और आम जनता को बंधक बनाकर सरकार और सेना को ब्लैकमेल करने की कोशिश करने लगे।

बस फिर क्या था! सेना के पास कोई और रास्ता नहीं था और 5 जून की रात को 6 इनफैंड्री बटालियन के साथ जनरल बरार ने सेना को स्वर्ण मंदिर के अंदर घुसने का हुक्म दे दिया और जांबाज कमांडोज ने लोगों की आस्था का ध्यान रखते हुए इस सफल ऑपरेशन को अंजाम दिया।
इस ऑपरेशन के दौरान शाबेग सिंह और जनरैल सिंह भिंडरवाला मार गिराया गया। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि शाबेग सिंह खुद सेना के एक अधिकारी रहे थे और उन्होंने ही आतंकवादियों को ट्रेनिंग देने का राष्ट्रदोही निर्णय लिया था।

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जनरल बरार को ऑपरेशन ब्लू स्टार के लिए हमेशा सराहना मिली, लेकिन उनके ऊपर कई बार जानलेवा हमले किए गए, पर आतंकवादी मानसिकता के लोग इसमें कामयाब नहीं हो सके और सरकार ने उनकी निष्ठा और वीरता के लिए परम विशिष्ट सेवा मेडल से जनरल बरार को सम्मानित किया।

रोनाल्ड रीगन: नाम तो सुना ही होगा?

अगर आप अमेरिकन पॉलिटिक्स के बारे में दिलचस्पी रखते हैं अथवा आप हालीवुड फिल्मों के बारे में दिलचस्पी रखते हैं तो रोनाल्ड रीगन का नाम आपके सामने जरूर आया होगा। जी हां! हम बात कर रहे हैं अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन की जो एक फिल्म अभिनेता से राष्ट्रपति बनने का सफर तय करने में सफल रहे हैं। आइये जानते हैं इस प्रेरक नेता की कहानी-

6 फरवरी 1911 को रोनाल्ड रीगन का जन्म हुआ था। बाद में इनका परिवार डिक्सन चला गया और वहीं से इनकी शिक्षा-दीक्षा पूरी हुई। बाद में कॉलेज के दौरान ही रीगन को नाटक करने का चस्का लगा और वहीं से इनकी अभिनय की यात्रा भी शुरू हुई। तमाम व्यक्तियों की तरह इन्हें भी पहली बार में सफलता नहीं मिली, इसीलिए इन्होंने स्पोर्ट्स एनाउंसर के तौर पर रेडियो में नौकरी कर ली।

किस्मत पलटी और 1937 में वॉर्नर ब्रदर्स के साथ फिल्मों के लिए इनका एग्रीमेंट हो गया। बाद के समय में यह एक सफल अभिनेता के तौर पर 50 फिल्मों में काम करके नाम कमाने में सफल रहे। फिल्मी दुनिया की एसोसिएशन स्क्रीन एक्टर्स गिल्ड के अध्यक्ष भी रोनाल्ड रीगन रहे और यही इनकी मुलाकात नैंसी डेविस नामक अभिनेत्री से हुई।

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बाद के दिनों में इनमें प्यार पनपा और 1952 में यह दोनों शादी के बंधन में बंध गए। रीगन की यह दूसरी शादी थी।

असली मोड़ आया 1954 में जब इन्होंने वीकली टेलीविजन नाटक ‘द जनरल इलेक्ट्रिक थिएटर’ की एंकरिंग की। इसके लिए उन्होंने अमेरिका के विभिन्न भागों में यात्रा की और यहीं से उनके मन में राजनीतिक विचार पनपते चले गए। इसी क्रम में रीगन सरकार की योजनाओं से लेकर सामाजिक मुद्दों पर अपनी राय रखते चले गए और 1960 आते-आते यह एक चर्चित रिपब्लिकन लीडर के तौर पर उभर चुके थे। 1966 ईस्वी में यह चुनाव लड़े और कैलिफोर्निया के गवर्नर बने। 1970 में दोबारा गवर्नर बने और बाद में राष्ट्रपति चुनाव के लिए इनके मन में इच्छा जागृत हो गई।

पार्टी द्वारा एक टर्म के लिए ना-नूकर करने के बाद 1980 में राष्ट्रपति पद के लिए पार्टी की तरफ से यह नामित हो गए और 69 साल की उम्र में वह यूएस के राष्ट्रपति चुन लिए गए।

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यह उम्र कुछ ज्यादा ही थी और इसके लिए उनकी आलोचना भी हुई, लेकिन रीगन सर्वाधिक वोटों से जीतने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति आज तक बने हुए हैं और यही बात तत्कालीन समय में विपक्ष को ले डूबी। अमेरिका के 40वें राष्ट्रपति के तौर पर उन्होंने 8 साल का अपना कार्यकाल पूरा किया।

बाद में इन पर कातिलाना हमला भी हुआ था, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें बचा लिया और पद पर रहते हुए गोली खाने के कारण बाद के दिनों में अमेरिकी राष्ट्रपति की सुरक्षा-व्यवस्था विश्व में सर्वाधिक मजबूत बनाने की दिशा में पहल शुरू हुई।

एक बहुआयामी व्यक्ति के तौर पर जिस प्रकार से रोनाल्ड रीगन ने एक लंबा सफर तय किया और विभिन्न क्षेत्रों में इन्होंने अपना दखल रखा, वह अपने आप में लाजवाब है। अभिनेता और राजनेता के अलावा यह सेना में भी काम कर चुके थे और इस लिहाज से इनकी यात्रा खास कही जाएगी। खासकर, रोनाल्ड रीगन ने जिस बड़े अंतर से अपने विपक्षियों को हराया वह भी 69 साल की उम्र में वह इनके जज्बे और इनकी इच्छा शक्ति को दिखाता है।

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आप रीगन की राजनीति के बारे में क्या कहेंगे, कमेंट बॉक्स में अवश्य बताएं।

कितना जानते हैं आप ‘आपातकाल’ के संजय गांधी को?

आजादी के बाद भारत में अगर कोई एक राजनीतिक परिवार केंद्रीय सत्ता के सर्वाधिक करीब रहा है और उस को प्रभावित करता रहा है, तो वह गांधी परिवार है। जवाहरलाल नेहरू के जमाने से वर्तमान में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी तक गांधी फैमिली केंद्रीय राजनीति को अफेक्ट कर रही है।
इस परिवार से जहां देश को तीन प्रधानमंत्री मिले, वहीं संजय गांधी के रूप में एक ऐसा व्यक्ति भी मिला, जिसने आपातकाल लगाकर समूचे राष्ट्र को सकते में डाल दिया। जी हां! यह संजय गांधी ही थे जिन्होंने अपनी मां इंदिरा गांधी के कार्यकाल को विवादित बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आइए जानते हैं इस युवा नेता की कहानी को, जिसने भारतीय राजनीति को गहरे तक प्रभावित किया।

1946 में संजय गांधी का दिल्ली में जन्म हुआ था और उनकी शुरुआती पढ़ाई लिखाई देहरादून के दून कॉलेज से हुई। हालांकि वह स्कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़ चुके थे और बिना किसी डिग्री के ही आगे के जीवन का सफर तय किया। यूं उनकी रुचि ऑटोमोबाइल इंजीनियर बनने में थी और इसके लिए उन्होंने इंग्लैंड की रोल्स रोइस कंपनी के साथ इंटर्नशिप भी की थी। बाद में उन्होंने पायलट बनने के लिए कमर्शियल पायलट का लाइसेंस भी लिया, लेकिन उनकी किस्मत में राजनीति लिखी थी और वह राजनीति में ही आए।

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जब देश में इमरजेंसी लगी थी, ठीक उसी वक्त संजय गांधी भी राजनीति में सक्रिय हुए थे। वह कुछ करना चाहते थे, लेकिन इसके लिए उन्होंने सत्ता को पूरी तरह से नियंत्रित करने की अधिनायकवादी राह चुनी। कहते हैं कि वह किसी मंत्री या नौकरशाह की बिल्कुल भी नहीं सुनते थे और इंदिरा गांधी भी अपने बेटे के आगे कुछ ज्यादा बोल नहीं पाती थीं।

संजय गांधी ने वृक्षारोपण, दहेज-प्रथा को खत्म करना, परिवार नियोजन, शिक्षा व जातिवाद को हटाना इत्यादि पर जोर दिया, लेकिन परिवार नियोजन के लिए संजय गांधी ने जबरदस्ती नसबंदी कराना शुरू कर दिया। उनकी इस पहल का बड़े स्तर पर विरोध हुआ, लेकिन संजय गांधी को इससे कुछ खास फर्क नहीं पड़ा। परिवार नियोजन के अलावा प्रेस पर सेंसरशिप के लिए आपातकाल बदनाम है ही! कहते हैं किशोर कुमार के गानों तक को संजय गांधी ने आपातकाल में प्रतिबंधित करा दिया था। जनता विरोध में आती गयी और इस तरीके से कांग्रेस पार्टी 1977 में चुनाव हार गई थी। संजय गांधी भी पहली बार सांसद नहीं बन सके थे, हालांकि बाद के चुनाव, 1980 में संजय गांधी जरूर सांसद बने।

संजय गांधी के साथ मारुति मोटर्स का भी जिक्र आता है, क्योंकि संजय गांधी का यह सपना था कि मध्यम वर्गीय परिवार के पास कार हो। इसके लिए संजय गांधी ने कोशिश भी की, लेकिन मारुति कंपनी की पहली कार 800 उनकी मौत के बाद ही मार्केट में आ सकी थी।

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संजय गांधी की तरह उनकी प्रेम कहानी भी बड़ी मशहूर है। उनसे 10 साल छोटी मेनका गांधी तत्कालीन समय में मॉडल थीं। बॉम्बे डाइंग कंपनी की मॉडलिंग करते हुए संजय गांधी को मेनका से प्यार हो गया था, लेकिन मेनका का परिवार संजय से रिश्ते के खिलाफ था। इस खिलाफत के बावजूद दोनों ने 1974 में शादी कर ली।

संजय गांधी की मौत की कहानी भी बड़ी रहस्यमई है। कई सारी अफवाहों के बावजूद कहते हैं कि संजय गांधी हवाई स्टंट करते रहते थे और 1980 में सफदरजंग एयरपोर्ट से हवाई जहाज उड़ाते हुए संजय गांधी बड़े एक्सीडेंट के शिकार हो गए और दुनिया को छोड़ कर चले गए। संजय गांधी की मौत के बाद मेनका गांधी, इंदिरा गांधी के साथ विवाद में फंस गयीं और वह अलग रहने लगीं।

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बहरहाल इस युवा लीडर ने तत्कालीन भारतीय राजनीति को बड़े स्तर पर प्रभावित किया और आपातकाल में उसकी ज्यादतियां याद की जाती रहेंगी। हालांकि भारत को लेकर 5 सूत्रीय कार्यक्रम जो ठीक ढंग से लागू नहीं हो सका उसे भी संजय गांधी के कार्यों में शुमार किया जाता रहेगा।

‘मसालों के शहंशाह’ की प्रेरक कहानी जानिए

एक तांगे चलाने वाला व्यक्ति दुनिया भर में अपने ब्रांड की पकड़ बनाता है और उसे बनाए रखता है! पर महाशय जी के बारे में सिर्फ यही बात खास नहीं है बल्कि खास बात यह है कि यह उन्होंने वर्तमान समय में नहीं किया जब स्टार्टअप के लिए तमाम इकोसिस्टम उपलब्ध हैं, बल्कि यह उन्होंने आजादी के बाद उस दौर में कर दिखाया जब लोग अपनी रोजी-रोटी तक के लिए संघर्ष करते थे वह भी बंटवारे का दंश झेलने के बाद।

महाशय धर्मपाल गुलाटी जी की खासियत यहां तक भी नहीं रुकती बल्कि उन्होंने मार्केटिंग के जमाने में किसी चमकदार बोलीवुडीये चेहरे को हायर करने की बजाय खुद को ही अपने ब्रांड का एंबेसडर बनाया और इसमें वह पूरी तरह सफल रहे। महाशय जी की खासियत इतनी भी नहीं है बल्कि 90 वर्ष से अधिक उम्र में जब किसी के लिए ठीक से चलना भी मुश्किल होता है, तब महाशय जी अपनी कंपनी का समस्त कामकाज संभालने के साथ-साथ तमाम सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी भी रखते हैं, धर्म के तमाम कार्यों से लेकर सामाजिक रूप से जुड़ाव बरकरार रखते हैं।
ज़ाहिर है कि महाशय जी खुद को एक अद्भुत बिजनेस लीडर साबित कर चुके हैं।

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1923 में जब पाकिस्तान के सियालकोट में धर्मपाल गुलाटी का जन्म हुआ था तब उनके पिता की मसालों की एक दुकान थी। उस वक्त परिवार की हालत कुछ ठीक न थी, इसीलिए महाशय जी में पांचवी के बाद स्कूल जाना छोड़ दिया और पिता की मदद करने लगे। पहले उन्होंने शीशे का व्यापार किया, फिर कारपेंटर, हार्डवेयर इत्यादि का व्यापार किया लेकिन कोई व्यापार सफल नहीं हुआ।

अंत में उन्होंने महाशय दी हट्टी के नाम से “देगी मिर्च वाले”बनकर व्यापार शुरू किया। परिवार का गुजारा होने लगा, तभी देश बंटवारे की तरफ बढ़ गया। बंटवारे में उन्हें सब कुछ छोड़ कर भारत आना पड़ा और अमृतसर के रिफ्यूजी कैंप में उन्होंने शुरुआती दिन बिताए। बाद में अमृतसर से निकलकर वह दिल्ली आ गए और मात्र 1500 रूपयों के साथ उन्होंने एक तांगा खरीदा।

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कनॉट प्लेस से करोल बाग तक यह महान शख्सियत तांगा चलाया करती थी और कुछ ज्यादा आमदनी ना होने के कारण फिर उन्होंने मसालों का व्यापार पुनः शुरू करने का निर्णय लिया।

इस तरह महाशय धर्मपाल गुलाटी ने अजमल खान रोड पर अपनी छोटी सी मसालों की दुकान खोली और उसके बाद अपनी शुद्धता से वह लगातार ग्राहकों को आकर्षित करते चले गए।

दिल्ली में सियालकोट वाले धर्मपाल जी का नाम बड़ी तेजी से ख्याति प्राप्त करने लगा और तब 1959 में कीर्ति नगर में महाशय दी हट्टी का नाम बदलकर एमडीएच के नाम से उन्होंने फैक्ट्री डाल दी। तमाम मशीनें आईं और एमडीएच की खासियत यह रही कि उन्होंने अपने मसालों में कोई मिलावट नहीं की।

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समझना मुश्किल नहीं है कि आखिर 50 प्रकार के मसाले न केवल भारत में बल्कि एमडीएच का ब्रांड जापान, स्वीटजरलैंड, अमेरिका इत्यादि तमाम देशों में क्यों पापुलर है?

वस्तुतः महाशय जी ने कभी भी मार्केटिंग के जमाने में कोई भी चीज “ओवर सेल” नहीं करी, उन्होंने चीजों को बढ़ा चढ़ाकर नहीं दिखाया, बल्कि बड़े ही सादे तरीके से वह अपने प्रोडक्ट्स की ब्रांडिंग खुद ही करते थे। इस प्रकार से आने वाले समय के लिए युवाओं को प्रेरणा देने का वह सबसे बड़ा स्रोत बन गए। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि उनकी मौत की कई बार अफवाहें उड़ी, लेकिन महाशय जी पूरी तरह से चुस्त-दुरुस्त-तंदुरुस्त हैं। अपनी कंपनी के तमाम कार्य वह खुद करते हैं और नीतिगत फैसलों पर अपना निर्णय सुनाते हैं।

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इस अद्भूत और महान बिजनेस लीडर की कहानी आपको कैसी लगी कमेंट बॉक्स में अवश्य बताएं।

जगजीवन राम की कहानी

जगजीवन राम भारतीय राजनीति के आसमान में किसी चमकते हुए सितारे की तरह थे। यह अपने कार्यों के कारण दलितों का मसीहा तक कहे गए। यह केवल राजनीतिज्ञ ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने आजादी के आंदोलन में अपना बहुमूल्य योगदान भी सुनिश्चित किया। उनके बारे में कहा जाता है कि उन्हें प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने का अवसर भी मिला था, लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया था। आइए जानते हैं इस बेहद महत्वपूर्ण दलित नेता की कहानी को-

जगजीवन राम का जन्म बिहार के आरा डिस्ट्रिक्ट में हुआ था और आपको यह पता ही होगा कि यह क्षेत्र ऊंच-नीच के भेदभाव से सर्वाधिक पीड़ित क्षेत्रों में शुमार रहा है। 5 अप्रैल 1908 को जन्म लेने के बाद से ही जगजीवन राम ने समाज का भेदभाव खुद और खुद के परिवार के प्रति बेहद रूखे रूप में महसूस किया।

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कहते हैं कि उनके पिता सुखीराम ब्रिटिश आर्मी के सदस्य थे जिनकी मृत्यु इनके जन्म के मात्र 6 साल बाद 1914 में हो गई थी। अपनी पढ़ाई के दौरान ही जगजीवन राम ने जातिगत भेदभाव का विरोध करने का प्रण लिया था और बाद के दिनों में उन्होंने ऐसा किया भी।

कहते हैं पढ़ाई के दिनों में उनके स्कूल में दो घड़े रखे थे, जिसमें से एक में ऊंची जाति के लोग पानी पीते थे तो दूसरे में छोटी जाति के लोग। हालांकि यह भी कहा जाता है कि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक मदन मोहन मालवीय उनकी प्रतिभा को शुरू में ही पहचान गए थे और उन्होंने बनारस आकर जगजीवन राम को पढ़ाई करने का न्योता तक दे डाला था।

बनारस और आसपास का पूर्वांचल क्षेत्र भी जातिवादी मानसिकता से बुरी तरह पीड़ित रहा है और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में जगजीवन राम को यही महसूस भी हुआ। वहां बाल कटवाने से लेकर भोजन परोसने तक में जब उन्होंने भेदभाव देखा तब वह सामाजिक आंदोलनों से जुड़ने की ठान चुके थे। कहा जाता है कि उसके बाद वह कोलकाता गए और महात्मा गांधी के आंदोलन में शामिल हो गए।

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तब 1934 में बिहार में एक बड़ा भूकंप आया था और यहां से जनता के साथ उनका सामाजिक जुड़ाव शुरू हो गया था। 1935 ईस्वी में कांग्रेस की तरफ से दलितों को विधायिका में हिस्सा देने के लिए जगजीवन राम को मौका दिया गया था और उसी साल उन्होंने आल इंडिया डिप्रेस्ड क्लास्सेस लीग की स्थापना की।

सामाजिक आंदोलन में सक्रियता के साथ आजादी के आंदोलन में भी जगजीवन राम भरपूर रूप से सक्रिय रहे और भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। कहते हैं कि वह जेल भी गए थे। बाद में 1946 में जवाहरलाल नेहरू ने जब अस्थाई सरकार का गठन किया था तो जगजीवनराम भी उस सरकार में युवा मंत्री के रूप में शामिल हुए थे।

जगजीवन राम ने श्रम मंत्री रहते समय कई महत्वपूर्ण एक्ट पास किये थे जिनमें इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट, मिनिमम वेजेस एक्ट एंप्लॉय प्रोविडेंट फंड इत्यादि प्रमुख रूप से गिनाए जा सकते हैं।

1952 में उन्हें संचार मंत्रालय का कार्यभार मिला और बाद में वह रेल और परिवहन मंत्री भी बनाए गए। उनकी राजनीतिक यात्रा अनवरत चलती रही और 1967 में इंदिरा गांधी की गवर्नमेंट में उन्हें रक्षा मंत्री का पदभार मिला और इन्हीं के रक्षा मंत्रित्व काल में 1971 में भारत-पाकिस्तान के ऐतिहासिक युद्ध में भारत को विजय मिली थी। जगजीवन राम के बारे में यह भी कहा जाता है कि आपातकाल लगाने के इंदिरा गांधी के फैसले का उन्होंने समर्थन किया था लेकिन कुछ ही दिनों बाद वह इंदिरा के खिलाफ भी हो गए थे।
आपातकाल के बाद जब जनता पार्टी की सरकार गठित हुई तो जगजीवन राम को उप प्रधानमंत्री का पद मिला था और राजनीतिक पदों में यह उनका शिखर पद था।

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पदों से दूर बात करें तो जिस प्रकार से जगजीवन राम ने दलितों के मसीहा के रूप में कार्य किया वह कार्य अविस्मरणीय है। बाद में 1986 में अपनी मृत्यु पर्यंत वह सांसद की भूमिका निभाते रहे, लेकिन मरने से पहले वह दलित मसीहा के रूप में अपनी छवि स्थापित कर चुके थे इस बात में दो राय नहीं।

ज्योति बसु की कहानी

2019 के आम चुनावों में बंगाल की बहुत चर्चा हुई। उक्त चुनाव में जिस प्रकार से राज्य की सीम ममता बनर्जी ने केंद्र की मोदी सरकार पर हमला बोला, उससे यह राज्य खासा चर्चा में आया। वैसे यह राज्य इससे पहले भी चर्चा में रहा है, जब इसमें तमाम पॉलीटिकल हत्याएं हुई। वैसे वहां पोलिटिकल हत्याओं का कल्चर पहले से ही चलता चला आ रहा है।
इन सबसे इतर इस राज्य के एक ऐसे नेता हुए हैं जिन्होंने एक लंबे समय तक राज्य की राजनीति को ना केवल राह दिखाई है बल्कि 24 सालों तक इस राज्य के मुख्यमंत्री भी रहे हैं। जी हां हम बात कर रहे हैं ज्योति बसु की। भारत में उन्हें लेफ्ट की राजनीति का ‘प्रकाश पुंज’ माना गया। आइये जानते हैं उनके बारे में-

8 जुलाई 1914 को कोलकाता में जन्मने वाले ज्योति बसु की शिक्षा दीक्षा सेंट जेवियर्स कॉलेज और उसके बाद प्रेसीडेंसी कॉलेज से पूरी हुई थी। बाद में 1935 में उन्होंने इंग्लैंड जाकर अपना वकालतनामा पूरा किया और यहीं से वह कम्युनिस्ट राजनीति को समझने की दिशा में भी बढे। कहा जाता है कि वह ब्रिटेन की कम्यूनिस्ट पार्टी के संपर्क में आने के बाद कम्युनिस्ट राजनीति की तरफ मुड़ गये थे। बाद में लंदन मजलिस नामक एक इंडियन पॉलीटिकल ऑर्गनाइजेशन के अध्यक्ष भी चुने गए थे।

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बाद में देश में लौटने के बाद उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के साथ काम करना शुरू कर दिया और 1944 में वह अपना एडवोकेट का प्रोफेशन छोड़कर पूरी तरह से पार्टी के प्रति डेडिकेटेड हो गए। 1964 में जब कम्युनिस्ट पार्टी का बंटवारा हुआ तब वह भारत की कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी को चुनकर इस दिशा में राजनीति करने लगे थे। इसी क्रम में 1967 में उन्हें बंगाल में चुनाव जीतने के पश्चात डिप्टी सीएम बनाया गया और 1977 में ज्योति बसु ने बंगाल के चीफ मिनिस्टर की जिम्मेदारी संभाली।

ज्योति बसु ने कुछ बड़े काम किये हैं, जिन्हें जनता के हित में माना जाता है। जैसे ऑपरेशन वर्घा है, जिसने तकरीबन 2000000 किसानों और भूमि रहित मजदूरों को जमीनें दी थी। जाहिर तौर पर तत्कालीन समय में यह एक बड़ा सुधार था। कहा जाता है कि कांग्रेस की केंद्रीय विपक्षी राजनीति को भी ज्योति बसु ने दिशा दी और संभवतः इसीलिए जब 1996 में गठबंधन सरकार बनने का अवसर आया तो यह कहा जाता है कि ज्योति बसु को भी प्रधानमंत्री के पद का ऑफर मिला था।

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हालांकि यह भी कहा जाता है कि उन्हीं के पार्टी के कुछ लोगों ने उन्हें प्रधानमंत्री बनने से रोक दिया।

हालांकि शिक्षा में उनके सुधारों ने कहीं ना कहीं नकारात्मक असर छोड़ा और ज्योति बसु ने भी इस तथ्य को बाद के दिनों में स्वीकार किया था। यह भी कहा जाता है कि ज्योति बसु के शासनकाल के दौरान ही कम्युनिस्ट पार्टी सरकार में हावी हो गई थी और इस कारण योग्यता का क्षरण होने से बंगाल अन्य राज्यों की तुलना में बिछड़ता चला गया था। इसी प्रकार से गुंडागर्दी का बढ़ावा भी इन्हीं के शासनकाल में माना जाता है, जिसके कारण बंगाल में तमाम बड़े उद्योगपतियों ने निवेश की संभावनाओं से किनारा कर लिया।

बहरहाल हर व्यक्ति के भीतर कुछ सकारात्मक, तो कुछ नकारात्मक पक्ष अवश्य होता है, लेकिन ज्योति बसु की इस बात की तारीफ करनी होगी कि सन 2000 में उन्होंने स्वेच्छा से मुख्यमंत्री पद त्यागा और राजनीति से संन्यास ले लिया। इसके ठीक 10 साल बाद 17 जनवरी 2010 को उनका देहावसान हो गया था।

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निश्चित रूप से जब तक भारतीय राजनीति में कम्युनिस्ट पार्टी का जिक्र होगा तब ज्योति बसु का भी जिक्र किया जाएगा और उनके लंबे शासनकाल को भी इसी तरह से याद किया जाता रहेगा।